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Friday, 3 February 2017

यादे बक्त को आंशू से डहा देती है,,,,

मेरी और तुम्हारी तस्वीर .
बेड के उसी सिराहने पर रखी है , 
जहाँ तब थी ,,,,
ये ठन्डे और निशब्द उस जगह के बिलकुल नजदीक है ,,
जहाँ लेटते हुए तुम अपना सर रखती थी ,,
हमारा  चेहरा बीते हुए कल की मुस्कराहट में 
नहाया हुआ है ... 
जो आज अंशुओ की उस  ब्रस्टि  से ढका जाना 
बाकी है जिसने 
हजारो मील की दूरी तय की है ,,,
तुम्हे याद है गर्म जुलाई के वो तपते हुए दिन ,,,
और हाथो में हाथ डाले चलना .
हम सोच भी नहीं  सकते थे हम इतना दूर होंगे ..
और एक महीना दूर करेगा
उस प्यार को जो सालो हमने जिया ..
इस पल को अभी जियो कल हो न हो ,,
तुम सच ही कहती थी 
अब और असहनीय लगती है
ये इतनी लम्बी दूरी ...
जब सूने और अकेले दिन गुजरना चाहते  है ,,
और गुजरते है 
जव सूने और अकेले पल गुजरना चाहते है
और गुजरते है ..
और मै उनमे तुम्हे नहीं रख सकता ,,
क्यों  की यादे बक्त को आंशू से डहा देती है,,,, 

Friday, 19 March 2010

वो भारत का देव मुझे ताके जाता था ,,,,(प्रवीण पथिक)

वो भारत का देव मुझे ताके जाता था ,,,,
करूणा से लथ पथ अंतस में झांके जाता था ,,,,
कंधो पर पिचकारी के थैले टंगे ,,,,,
हाथो में धूसर रंग लिए ,,,,,
वन प्रतिमा सा अडिग खड़ा है ,,,,,
मानो मौन आवाहन किये ,,,,,
वो कान्ति मुझे अब झुलसाती है,,,,
जो उसके चेहरे की थाती है ,,,,
दर्ग अपलक देख रहे थे आने जाने वालो को ,,,,
उनमे फैली नीरवता हर पल रूदन सुना जाती ,,,,
मुट्ठी में भीचे पैसो की खन खनभूंखे पेट दिखा जाती ,,,,,
वो बड़ी संकुचित धीमी बोली से चिल्लाता था ,,,,
महगाई के अट्टहास में मौन पुनः हो जाता था ,,,,,
मुट्ठी के सिक्को को गिनता ,,,,
गिनता फिर रंगों के पैमानों को ,,,,
कभी फटी कमीज के धागों में उलझाता ऊँगली ,,,,
मानो अपने व्यवधानों की क्षमता आँक रहा हो ,,,,,
फिर झट से धागों को सयंत करता ,,,,,
ये देखो वो देखो गाडी के पीछे भाग रहा ,,,,,
ठिठक गया अब मौन हुआ ,,,,,,
फिर सूखी हंसी फैला देता ,,,
यह लगे या वहा लगे ,,,,,,
पर करुणा तीर चला देता ,,,,
हार मिली तो फिर सयंत हो आँखों से अंशु पोछ दिए ,,,,
याद उसे आते हर पल घर भूंखे पेट लिए ,,,,,
फिर उठा कर्म का झोला वो भागे जाता था ,,,,,
वो भारत का देव मुझे ताके जाता था ,,,,


Wednesday, 6 January 2010

कुछ स्याह ध्वनिया


अनमने मन से मै ,आत्मसंतुष्टि के द्वारा ,,
अविलम्बित जीवन के, अनुत्तरित से प्रश्नों को
अचंभित हो कर देख रहा था ,,
कर रहा था पूर्वालोकन ,,
आलौकिक और आकस्मिक ध्वनियों का ,,
जो प्रतिध्वनित हो रही थी,,
मेरी अंतरात्मा के भीतरी प्र्ष्ठो से ,,
कुछ स्याह ध्वनिया लग रही थी ,,
प्रश्न्योचित उत्तरों सी ,,,
मै विस्मित था ,,,
निरन्तर क्षीण होती इच्छाशक्ति ....
खो रही थी संबल ,,,
फिर भी मै मौन एवं सचेत था ,,,
ओढ़ रखी थी मैंने गम्भीरता ,
छदम सहनशीलता का आलम्बन लेकर,,,,
असहनीय हो रही उत्कंठा और जुगुप्सा ,
आत्मकेंद्रित हो कर,,,
दिखाना चाहती थी अपनी उपस्थिति का कारण ,,
पर मन मौन ही ,,
बुन रहा था निर्लिप्तता का अंत हीन आवरण ,,,
शायद कुछ अस्पस्ट ही सही ,,,
घट तो रहा था ,,
तभी तो मै मौन और सम्बल हीन होकर भी ,,,
मह्शूश कर रहा हूँ आलम्बन ,,,
हे दया निधे सारी तेरी ही कृपा है,,,,