Friday, 3 February 2017
यादे बक्त को आंशू से डहा देती है,,,,
Monday, 3 January 2011
बे बजह ही सही मुस्करा लूँ तो चलूँ ,,,,,,,
बे बजह ही सही मुस्करा लूँ तो चलूँ ,,,,,,,
इन तंग वादियों में घुल रही है जो ,,,
बे खौफ सी धूप को बचा लूँ तो चलूँ,,,
नस्तर पैविस्ती की मिशाले दिख रही है ,,
कुछ जख्म मै भी उठा लूँ तो चलूँ .,,,,,,,
जब चलना ही है तो चलता रहूँगा ,,,
एक ठहराव भी मिला लूँ तो चलूँ ,,,,,
सब सर्द सा सब जाम सा सब जमा हुआ ,,,
इस बर्फ को पिघला लूँ तो चलूँ ........
वहा फकत सफ्फाक सा सब सफ़ेद है ,,,
कुछ चुलबुले रंग मै उठा लूँ तो चलूँ ,,,,,
Wednesday, 21 April 2010
जीवन है संग्राम यहाँ , तुम रण की भाषा बोलो ,,,,,(प्रवीण पथिक)
जीवन है संग्राम यहाँ , तुम रण की भाषा बोलो ,,,,,
उठ चलो पथिक चिंगारी को ,तुम आग बना दो ,,,,
निर्बल को सम्बल देके , सोये भाग्य जगा दो ,,,,
उठ चलो पथिक ,, मंदिर मस्जिद गुरूद्वारे छोडो ,,,
जड़ता सूचक है ये ,, मजहब ही दीवारे तोड़ो ,,,,,
उठ चलो पथिक, तुम नव युग का उदघोष करो ...
नव गठित सभी संरचना हो ,वाणी में भी रोष भरो ,,,,
उठ चलो पथिक तुम समता का संचार करो ,,,
न शोषक हो न शोषित हो शोषण का प्रतिकार करो ,,,
उठ चलो पथिक तुम जग में दिनकर सा छा जाओ ,,,,
तुम दीपक बन जलो, दिवाकर बन तम खाओ ,,,,
उठ चलो पथिक इस विष घाटी को अमृत कर दो ..
झट उलट पुलट घट घट अमृत रश भर दो ,,,
उठ चलो पथिक , तुम नर बाघों का संहार करो ,,,
स्वच्छंद विचरणी वसुंधरा हो ऐसा तुम आधार करो ,,
उठ चलो पथिक तुम पदचिन्हों का त्याग करो ,,,
नव पथ के पथगामी बन चिर पथ पर पदभाग धरो ,,,
उठ चलो पथिक तुम त्यागो जीवन की सहज सहजता को ,,,
हर पथ कंटक वाला लो जिसमे गहन विषमता हो ,,,
उठ चलो पथिक तुम चिर विकाश कर नूतन पंथ चला दो ,,,
सामराज्य विजयी आदि मतों को समदर्शी समरंग बना दो ...
उठ चलो पथिक तुम आभासी चोला छोडो ,,,
जीवन है संग्राम यहाँ , तुम रण की भाषा बोलो ,,,,,
Tuesday, 6 April 2010
म्रत्यु तो नव जीवन का प्रसार
राग में वैराग का आभास ,
तुम्ही दे सकते हो
व्यथित मन थकित तन को ,
चिर विकाश कर थकान
तुमही हर सकते हो
क्या शुभ क्या अशुभ ,
तुम कण वासता हो ।
फिर क्यों दिग्भर्मित मैं ??
उखाड दो न इस दासता को ,
जग मय आप आप मय जग
भेद विभेद क्षण भंगुर है ,
फिर क्यों इस भेदता का,,
प्रखर ज्ञान होता?/
क्यों? जान कर भी स्वाभिमान सोता ॥
क्यों कुंद है ??,,,,,,,,,
सब ज्ञान की नाले …।
क्यों सुप्त है ??,,,,,,,,,,,
सब सत्य की डाले ……
अमरत्व कहाँ सोता है ???
क्यों मृत्यु से रोता है ??
ये नवीनता है नव संचार है
नए युग का प्रसार है
दुःख क्या इस में ???
जीर्ण से जीर्ण नव्य होंगे
म्रत्यु तो नव जीवन का प्रसार
Sunday, 28 March 2010
हुआ हूँ फिर उपस्थित तेरे सम्मुख ,,,, ओ दयानिधे(प्रवीण पथिक) ,,,,
अधबनी नौका लेकर ,,,
हुआ हूँ फिर उपस्थित तेरे सम्मुख ,,,,
ओ दयानिधे ,,,,
टकटकी लगा रखी है ,,,,
तेरी हर अनुग्रही क्रिया पर ,,,,
की काश कोई द्रष्टि इधर भी हो ,,,,
ओ समग्र नियन्ता ,,,,
मेरी इस मौनाकुल पीड़ा को ,,
तुम समझ सकते हो ,,,,
क्यों की तुम हो दिव्य द्रष्टा ,,,
हर्दय के मंथन से निकली हुई ,,,
अतृप्त इच्छाओ की तीव्र वेदनाये ,,,
बुलबुले सा एकत्र हो कर,,,
बना रही है एक अभेद पर्त,,,
अज्ञान और अनिच्छा की ,,,
सम्मिलन दूर दिख रहा है ,,,,
ज्ञान कुंद और सुप्त सा है ,,,,
फिर भी मै आशान्वित हूँ ,,,
तेरी आभाषी प्रवर्ती को लेकर,,,
तेरे साथ काल्पनिक सम्मिलन को लेकर ,,,
आनंददायक मिलन को लेकर ,,,
आत्मा की अत्रप्त्ता बढती ही जा रही है ,,,,
सजगता और स्वीकार्यता के छल ,,,
अब नहीं सहन होते ,,,
समग्र बंधन अब सिथिल है ,,,
नहीं झेल पाते मिलन की उत्कंठा के उफान को ,,,
बस अब और नहीं हे प्रिये बंधन खोल ,,,
आलिंगन में ले लो
Wednesday, 27 January 2010
अनुभूति

अनावश्यक की जिज्ञासा ,,,
और प्रयाश करता है ढूडने का,,,
अनुत्तरित से कुछ प्रश्नों का उत्तर ,,,
तब संवेदनाये जैसे मर सी जाती है,,
तब रह जाती है केवल और केवल,,,
पिपाशा
अनुपलब्धता को उपलब्ध करने की ,,
अनुपस्थित को उपस्थित करने की ,,,
अप्राप्त को प्राप्त करने की ,,,,
सुप्त इच्छाये भी तब होने लगती है ,,,
जाग्रत ,,,
या यूँ कहे इच्छाओं का साम्राज्य ,,,
एक और उपलब्धि की चाहत ,,,
बढा देती है और उत्कंठा ,,,
बढा देती है और कुंठा ,,,
तब एक छत्र राज्य होता है ,,,
निष्क्रियता का ,,,
बढती जाती है तुझसे दूरी ,,,
कदम दर कदम ,,,,,
हर कदम अन्मिलन की ओर बढ़ता जाता हूँ
क्यों की वही तो है इच्छाओं की इति ,,,
और पतन की इति भी ,,,,
Wednesday, 20 January 2010
अनन्त लक्ष्य की उड़ान ,,,
निर्भीकता के पथ पर ,,,
भरते है अनन्त लक्ष्य की उड़ान ,,,
अदम्य जीवन का सच ,,
मानो होने लगता है मुखरित ,,
यही तो पहली उड़ान है ,,,
और शायद अंतिम भी ,,
क्यों की यही तो इति है ,,,
और अति भी ,,,
भ्रम सारे हो जाते है विन्यासित ,,,
छोड़ कर अस्पस्टता का दामन ,,,
मन तीव्र पीड़ा से निकल
खुद ढूंडने लगता है अपने लक्ष्य को ,,
जो की है निश्चय ही संतुस्टी ,,,
यही तो है मिलन की इति भी ,,,
ओ असीम नियन्ता ,,,
और तुझे जानने का कारक,,,
और कारण भी
Tuesday, 12 January 2010
उदबोधन

संभाविता की ,,,,,,,,,,,,,
जब शुरू होती है ,,,
आत्म विश्लेषण की प्रव्रति,,,,
जब निरन्तर होने लगता है ,,,
निर्धारण ,,,,,,,,,,,,
पूर्ण और अपूर्ण का ,,,,,
गेय और अज्ञेय का ,,,
गम्य और अगम्य का ,,,
प्राप्य और अप्राप्य का ,,,,
सच में तभी होता है,,,,
उत्क्रस्टता की ओर गमन ,,,
निश्चल उत्क्रस्टता ,,,
खुद ही होने लगती है अर्जित ,,,
छलता और विचलता होती है पराजित ,,
निश्चित ही प्रस्फुटित होने लगता है ..
कुछ उदबोधन,,,,,
अंतरात्मा की विहंगमता से ,,,,,,,
प्रकट होने लगती है समता विषमता से ,,,,
तब मन निर्भय हो मान खोकर ,,,
हो जाता है अहल्दित ,,,
सच में सत जीवन की यही शुरुआत है,,,,
Wednesday, 6 January 2010
कुछ स्याह ध्वनिया

अविलम्बित जीवन के, अनुत्तरित से प्रश्नों को
अचंभित हो कर देख रहा था ,,
कर रहा था पूर्वालोकन ,,
आलौकिक और आकस्मिक ध्वनियों का ,,
जो प्रतिध्वनित हो रही थी,,
मेरी अंतरात्मा के भीतरी प्र्ष्ठो से ,,
कुछ स्याह ध्वनिया लग रही थी ,,
प्रश्न्योचित उत्तरों सी ,,,
मै विस्मित था ,,,
निरन्तर क्षीण होती इच्छाशक्ति ....
खो रही थी संबल ,,,
फिर भी मै मौन एवं सचेत था ,,,
ओढ़ रखी थी मैंने गम्भीरता ,
छदम सहनशीलता का आलम्बन लेकर,,,,
असहनीय हो रही उत्कंठा और जुगुप्सा ,
आत्मकेंद्रित हो कर,,,
दिखाना चाहती थी अपनी उपस्थिति का कारण ,,
पर मन मौन ही ,,
बुन रहा था निर्लिप्तता का अंत हीन आवरण ,,,
शायद कुछ अस्पस्ट ही सही ,,,
घट तो रहा था ,,
तभी तो मै मौन और सम्बल हीन होकर भी ,,,
मह्शूश कर रहा हूँ आलम्बन ,,,
हे दया निधे सारी तेरी ही कृपा है,,,,
Friday, 1 January 2010
और बरस एक बीत चला ,,,
और बरस एक बीत चला ,,,
और बरस एक बीत चला ,,,
सांसो का संगीत चला ,,,
पिछली सब धूमिल यादे,,,
अंकित करता अंकित करता,,,
अपनों का ये मीत चला ,,,
और बरस एक बीत चला ,,,
सब मीठी वा तीखी यादे ,,,
कुछ आधे कुछ पूरे वादे ,,,
आगोसो में अपने लेके ,,,
जीवन का ये मीत चला ,,,
और बरस एक बीत चला ,,,
कर धैर्य परिक्षा जीवन की ,,,
ले अग्नि परिक्षा इस तन की ,,,
साहस की एक सीख सिखा के ,,,
अपनों से हो भय भीत चला ,,,
और बरस एक बीत चला ,,,
रखूगा तुमको यादो के ,,,
सुंदर से एक झरोखे में ,,,
रातो का सपना जैसे,,,
अपनों का ये मीत चला ,,,
और बरस एक बीत चला,,,
आने बाला कल होगा,
यादो का सगूफा जैसे ,,,
तुम अंतस के चेरे थे ,,,
भूलूंगा तुमको कैसे ,,,
भरती आँखों का गीत चला ,,,
और बरस एक बीत चला ,,,
प्रवीण पथिक
Friday, 11 September 2009
शमा औकात में जले बेहतर है ,,(कविता)

तब शमा औकात में जले बेहतर है ,,
जब फुन्गियो पे दौड़ का ऐलान हो ,,
तब जहां हाथ पे चले बेहतर है ,,
जब बुजदिलो के हाथ में सरकार हो ,,,
जुल्म का प्रतिशोध न पले बेहतर है ,,
जब बासिंदों में रिहायस का टकराव हो ,,
बस्तिया हँसती-हँसाती मिले बेहतर है ,,,
जब मजहबो से भगवान् की पहिचान हो ,,
मिलना नहीं खुल कर गले बेहतर है ,,,
Thursday, 27 August 2009
क्यों की कथित प्रगति वादी जो हूँ ,,,,, (कविता)
कर रहा था आत्म मंथन ..प्रगति और प्रगतिशीलता का ,,
अवचेतन मन से ,,
तौल रहा था अपनी नीति,
संस्क्रती की अवनति,,
व्यवहारिकता के तराजू पर रख कर,,,
और बार बार उठा रहा था लान्छन,,,
अपने जमीर पर ,,
दे रहा था शाव्दिक गलियाँ ,,
अपनी नियति को ,,
हर बार दे रहा था पश्चिमता की दुहाई ,,
प्रगति की राह पर ,,
क्यों की कथित प्रगतिवादी जो हूँ ,,,
जड़ से कटना नहीं चाहता ,,
पर प्रगति जो करनी है ,,
नहीं खोना चाहता पहिचान को ,,
पर नयी पहिचान कैसे लूंगा ,,,
खुद को प्रगति वादी कैसे कहूंगा ,,
सम्पूर्णता और अपूर्णता के द्वंद में ..
अर्ध विछिप्त सा फिर रहा हूँ,,
पकड़ रखी है प्रगति की सीढ़ी ,,,
संस्क्रती और सभ्यता के जिस्म पर ,,
पैर रख कर,,,
दर्द है ,,
आँख भरी है ,,,
पर भावशून्य हूँ ,,,
Friday, 21 August 2009
मै धन्य हो गया ,,,,,(कविता)

निरन्तर संकुचित होती ,,
अपनी भावनाओं को सकेंद्रित कर ,,,
परिवर्तन की राह की ओर ताकता हुआ ,,
आत्मनिरिक्षण कर रहा हूँ,,
निज परिक्षण कर रहा हूँ ,,,
कुछ उनीदी सी छा रही है ,,
पर चैतन्य हूँ ,,,
कर रहे है चेष्टा मार्ग अबरुद्ध करने की ,,,
मौन के विशाल बबंडर,,,,
आ रही है एक नयी चुनौती ,,
हर पग पर ,,
गम्भीरता को मैंने ओढ़ रक्खा है ,,
फिर भी विचल हूँ ,,
स्थर होने के प्रयत्न में भी ,,,
चल हूँ ,,,
विपरीत परिस्थितिया ,,
आकास्मिक आघात कर रही है ,,,,
विपन्ता निरन्तर घात कर रही है ,,,
पर निज का खुला पन ,,,
मिलन की राह तैयार कर रहा है ,,,
उस पर तेरा सम्बोधन ,,,
सम्मिलन की राह तैयार कर रहा है ,,,
तभी कुछ हवाओं सी सनसनाहट हुई ,,,
और मै विलुप्त हो गया ,,
अब तू ही है "मै " लुप्त हो गया ,,,
ओ अकिंचन दिव्यद्रष्टा ,,,
मै धन्य हो गया ,,,,,
Friday, 14 August 2009
दंगा (कविता)

चहकता हुआ चौराहा , महकता हुआ चौराहा ,,,
वहा उड़ती हुई पतंगे थी , घूमती हुई फिरंगे थी ....
सजती हुई मालाये थी,, लरजती हुई बालाये थी ,,,
चमकते चमड़े की दूकान थी,महकते केबडे की भी शान थी ,,
रफीक टेलर भी वही था , और हरी सेलर भी वही था ,,,
वहा पूरा हिन्दुस्तान था , हर घर और मकान था ,,
मेल मिलाप और भाई चारा था , कोई नहीं बेचारा था ,,
पर एक चीज वहा नहीं थी , जो न होना ही सही थी ,,
वहा नहीं था तो पुरम ,पुर और विहार नहीं था ...
वहा नहीं था तो दालान ,वालान और मारान नहीं था,,,
गली कासिम जान भी नहीं थी, और गली सीता राम भी नहीं थी ,,,,
वहा हिन्दू भी नहीं था , वहा मुसलमान भी नहीं था ,,
था तो केवल हिन्दुस्तान था , था तो केवल भारत महान था ,,
फिर एक आवाज आई मैं हिन्दू हूँ ,,
उसकी प्रतिध्वनी गूंजी मैं मुसलमान हूँ ,,,
और उस लय का गला घुट गया ,जो कह रही थी मैं हिन्दुस्तान हूँ ,,
सुनते ही सन्नाटा पसर गया ,,
उड़ते उड़ते हरी पतंग ने लाल पतंग मजहब पूछ लिया ,,
हरी ने रफीक के सीने में चाकू मार दिया ,,
सब्जियों में भी दंगा हो गया , अपना पन सरेआम नंगा हो गया ,,
बैगन ने आलू के कान में फुसफुसाया ,,मियां प्याज को पल्ले लगाओ ,,
कद्दू ने कुछ जायदा ही फुर्ती दिखाई,प्याज को लुढ़का दिया,,,
और वो पहिये के नीचे आ गया ,,
लहसुन ने मिर्ची को मसल दिया , क्यों की वो हिन्दू थी ,,
अब तो वहा पर कोहराम था ,क्यूँ की दंगा सरेआम था ,,
एक दूकान दूसरी दूकान से धर्म पूछ रही थी ,,
एक नुक्कड़ दूसरे नुक्कड़ से धर्म पूछ रहा था ,,
अब वहा पे वालान थे ,अब वहा पे मारान थे ,,
अब वहा पे पुरम था , अब वहा पे विहार भी था ,,
अगर कुछ नहीं था तो ,,
वहा पे हिन्दुस्तान नहीं था , मेरा भारत महान नहीं था ,,
अब वहा पर केवल हिन्दू था और मुसलमान था ,,
और वीरान ही वीरान था ,,
तभी किसी ने कहकहा लगाया और ताली बजाई ,,,
फिर उसने लम्बी साँस ली और ली अंगडाई,,
वो मुस्कराया क्यूँ की अब उसके मन का जहान था,,
फिर वह धीरे से बुदबुदाया मैं हिन्दू हूँ ,,
फिर वह धीरे से फुफुसाया , मैं मुसलमान हूँ ,,
और चल दिया अगले चौराहे पर,,
हिन्दुस्तान को हिन्दू और मुसलमान बनाने के लिए ,,
क्यों की यही तो उसका धर्म है और कर्म भी ,,
आखिर नेता जो है .....
Thursday, 13 August 2009
आ जा श्याम तोहे प्राण पुकारे ,(,कविता)
आ जा श्याम तोहे प्राण पुकारे ,,,
आ जा श्याम तेरी राह निहारे ,,,
नैना व्याकुल कारे कारे,,,
दे दो दर्शन मोहन प्यारे ,,,
प्यासा हूँ बस प्यास बुझा दो ,,,
मैं ना हूँ , हो राधे राधे ,,,
जीवन के अनमेल रसो से ..
द्वार पड़ा हूँ आन तिहारे ,,,
आ जा श्याम तोहे प्राण पुकारे ,,,
आ जा श्याम तेरी राह निहारे ,,,
तेरी बंसी की सुन्दर ताने ,,,
सुन कर तेरे मीठे गाने ,,,
सुध बुध खोऊ ध्यान लगाऊं ,,
पर किंचित चैना मैं ना पाऊं ,,,,
मिलने को बेसुध खडा हूँ ,,,
ओ मधुमय मन के उजियारे ,,,
आ जा श्याम तोहे प्राण पुकारे ,,,
आ जा श्याम तेरी राह निहारे ,,,
वन वन तट तट मैं तो घूमूं,,,
पग पग तेरी पद रज चूमूं ,,,
ओ नदनंदन ओ जीवन धन ,,
ओ मधु सूदन ओ दिग्दर्शन ,,,
मुझसे अपना मिलन करा दे ,,,
हे यदुवर , हे मोहन प्यारे ,,,
आ जा श्याम तोहे प्राण पुकारे ,,,
आ जा श्याम तेरी राह निहारे ,,,
मैं अबनी तू बादल साजन ,,,
वर्षो वर्षो बन प्रेमाघन ,,,,
तन भीगे और मन भीगे ,,,
भीगे मेरा सारा जीवन ,,,
पथ पथ घूमा पथिक बना हूँ ,,
राह दिखा दो जसुमति प्यारे ...
आ जा श्याम तोहे प्राण पुकारे ,,,
आ जा श्याम तेरी राह निहारे ,,,
Saturday, 8 August 2009
हाय अठन्नी के इतने चेहरे,, ,,{कविता}

पैसा बहुत महत्व पूर्ण चीज है ,, पर उसकी महत्वता व्यक्ति व्यक्ति पर निर्भर है किसी के लिए किसी राशि का होना न होना बराबर है और किसी के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि मैं ने गाँव के आम जन के जीवन को बहुत नजदीक से देखा है एक एक पैसा उनके लिए कितना महत्व पूर्ण है ,, इसे मैंने अनुभव किया है ,,,आज भी गाँव मेंकितने कम पैसे में इतनी अधिक चीज मिल जाती है जिसकी हम शहर में कल्पना ही कर सकते है ,,, क्यूँ ही न ये उनकी बिपन्नता के कारण हो इस कविता में मैंने आम जन की या कह सकते हो ग्रामीण आम जन की पैसे की उपयोगता और उपलब्धता को दर्शाया है
एक अठन्नी उछली तो ,,
आकर गिरी हाथ में मेरे
,,,
विस्मित हो मैंने देखा,,
और चौक पड़ा,,,,
हाय अठन्नी
के
इतने चेहरे,,
मै कुछ कहता तब तक ..
वो बोली ,,,,
मै कागज का फुर
फुर पंखा
,,
शक्कर के दो कम्पट हूँ ,,,
मै रोरी की पुड़िया,,,
और गंगा
का
सम्पट हूँ ,,,,
मै धनिये की गाडिया,,,,
अदरक की गांठी
,,,
मिर्चे की तीखी ,,,
फलिया हूँ ....
मै खडिये का डेला
मुल्तानी मिट्टी,,,
पडूये की डलिया हूँ ,,,,
मै पेन की
निव,,,
हूँ पेन की स्याही और चौपतिया हूँ ,,,
मै कपूर का टुकडा
फूलो
की माला और ,,
घी की बत्तिया हूँ ,,,
अब मै विस्मित था
,,,
सुनता जाता था
उसकी बोली ,,,
कुछ कहता इससे पहले ,,,
वो उछली और
उसकी होली ,,,
मै हतप्रभ
था ,,,
अब कुछ नहीं था हाथ में मेरे
बस
सोच रहा था ,,
हाय अठन्नी
के इतने चेहरे
एक अठन्नी उछली तो ,,
आकर गिरी हाथ में मेरे
,,,
Tuesday, 4 August 2009
जब तू ही ना है फिर तेरी यादे क्यूँ कर आती है ,, (कविता)

जब तू ही ना है फिर तेरी यादे क्यूँ कर आती है ,,
क्यूँ तेरे हंसने की बोली मुझको खूब रुलाती है ,,
क्यों मेरे माथे की रोली आंसू भर ले आती है,,,
जब भी व्याकुल हो मै गीतों की सांझ सजाता हूँ ,,,
गीतों की धुन में भी बस तेरी यादो को ही पाता हूँ,,,
जब कभी वेदनामय हो दे आवाज बुलाता हूँ ,,,
तू ना आई फिर भी तेरे अहसासों को पाता हूँ ,,,
बहना हर राखी पर राखी तेरी याद दिलाती है ,,,
इस राखी की हर पाखी हर पल तुझे बुलाती है ,,,
बहना तेरी बाते क्यूँ पल पल खूब सताती है .,,
जब तू ही ना है फिर तेरी यादे क्यूँ कर आती है ,,
बहना तुझको आज बुलाते घर ,आँगन चौबारे है,,
दरवाजा ड्योढी चौका छत व्यथित सभी बेचारे है ,,,
मंदिर की ज्योति भी बहना अब टीम-२ कर ही जलती है,,,
मानो तेरी यादो की धुन में, हर पल आहे भरती है,,,
बहना तेरी तस्वीरों को संदूकों में खूब सहेजा है,,,
सब यादो को खूब सहेजा है सब वादों को खूब सहेजा है ,,
जब पवनी से हिलती घंटी,मानो तू इठलाती है ,,,
जब मेघो में छिपती बिजली ,मानो तू शर्माती है,,,
बहना तेरी बाते क्यूँ पल पल , खूब सताती है .,,
जब तू ही ना है फिर तेरी यादे ,क्यूँ कर आती है ,,
बहना बाबू की रोती आँखे तूने ना देखि, पर वो रोते है ,,
तेरी यादो के लम्हों को पल पल वो, आंसूं बन धोते है ,,
जब से तू ना है पुस्तक बेकार पड़ीं है ,कैरम बेकार पड़ा है ,,
माँ की ढोलक भी बेजार पड़ी है ,,बेकार गिटार पड़ा है,,
माँ तो पूजा में भी , अब तेरी यादो में रोती है ,,
उसकी हर पूजा में बस तेरी यादे होती है,,
हर दिन माँ तेरी सारी चीजे, ला मुझे दिखाती है ,,,
कहती है तू आने को है ,, मुझसे सब सम्भलाती है,,,
बहना तेरी बाते क्यूँ पल पल , खूब सताती है .,,
जब तू ही ना है फिर तेरी यादे ,क्यूँ कर आती है ,,
Friday, 31 July 2009
फिर क्यूँ तुमने की ठिठोली ? (कविता)

अपने समानान्तर खड़ा करो दो,,,
मेरा जीवन खुशियों से भर दो .,,,,
आरक्षण की बोली भी ,,,,
मैंने नहीं बोली ,,,,,
फिर क्यूँ तुमने की ठिठोली ?
जाति और उपजाति के नाम पर,,,
आरक्षण देकर ,,,,
शायद इससे तुम्हारी राज नैतिक रोटियाँ,,
सिकती है,,,,
इन मुद्दों से ही तो राजनीति की गोटियाँ ,,,
बिछती है ,,,,
नहीं आबश्यकता मुझे अनुदानों की ,,,
नहीं आबश्यकता मुझे सम्मानों की ,,,
जनतंत्र गणतंत्र प्रजातंत्र ,,,,
का अर्थ मैं नहीं जानता,,,
और ना ही मांगी मैंने कभी ,,,
राहत राशि या राहत सामग्री ,,,
मुझे तो बर्षा चाहिए,,,
जो कि अब नहीं होगी,,,,
अब तुम चाहे सूखा ग्रस्त घोषित करो,,,
या फिर अकाल ग्रस्त ,,,,
अब चाहे तुम खुद के बजट के पैसे खाओ ,,,
या फिर केंद्र कि राहत भी उड़ा जाओ ,,,,
मुझे तो विपन्नता में ही जीना है ,,,
पानी नहीं आसूं ही पीना है,,,
मुझे मालुम है इस बार ,,,
मुन्ने के लिए जूते नहीं ला सकूँगा ,,,
बाबू का कुर्ता भी नहीं सिलबा सकूँगा ,,,
कहाँ से आएगी मुन्ना कि मां के लिए ,,,
चौडी किनारे वाली साड़ी ,,,
और विजुरिया का गौना भी तो नहीं हो पायेगा ,,,
क्यों कि इस बार धान नहीं होगा ,,,
फिर भी मुद्रा स्फीति कि दर बढेगी ,,,
सरकार प्रगति और प्रगति करेगी ,,,.
और खूब अनुदान बांटेगी,,,
सूखा आपदा राहत के नाम पर,,,
भले ही अखबारों में ही ,,,,
क्यों कि उसे वोट जो चाहिए ,,,
हो सकता है इस बार पड़ जाए ,,,
खाने के भी लाले,,,
पर मैं हार नहीं मानूगा,,,,
खून और किडनी भी नहीं बेचूंगा ,,,,
भले ही शहर कि झुग्गियों में रहना पड़े ,,,,
रह लूँगा ,,,,
जिल्लत और बदहाली में जीना पड़े,,,,,
तो जी लूँगा,,,
क्यों कि पेट जो भरना है ,,,,
कभी स्वेच्छा से आन्दोलन और प्रतिवाद ,,,
भी नहीं करूँगा,,,
यूँ जीते हुए भी तिल तिल मरूँगा ,,,,
क्यों कि यही तो,,,,,
मेरी नियति है,,,
Wednesday, 29 July 2009
तुम रथी मुझे अर्थी बना लो ,,,(कविता)

किस फंद में गिरा दिया ,,,,
एक बूंद से त्रस्त था ,,,,
सागर में डुबा दिया ,,,,
अब कौतुक कर ,,,
उसे निहरता है ,,,,
ह्रदय पट चीर के,,,,
विहरता है,,,,
अदभुद की कभी ,,,
आकान्क्षा नहीं की,,,,
असीम की कभी ,,,
लालसा नहीं की ,,,
फिर भी ऐसा अबरोध,,
इतना बिरोध ,,,,
क्यूँ इतना क्रोध ,,,,
नहीं है इतना बोध ,,,
क्यूँ कटुता लिए हो ,,,
क्यूँ शत्रु किये हो ,,,,
क्यूँ नहीं निकलने देते,,,
इस अनित्य जग के बंधन से ,,,
क्यूँ मुक्त नहीं होने देते ,,,
इस मय के क्रन्दन से ,,,
क्यूँ नहीं होने देते,,,
गम्य में अगम्य का भान ,,,
अंतस में मय का ज्ञान .....
बंधन तोड़ एकी कार कर दो,,,,
निज का सारथी बना दो ,,,,
तुम रथी मुझे अर्थी बना लो ,,,
किस चक्र में कसा दिया ,,,
किस द्वंद में फसा दिया ,,,
किस फंद में गिरा दिया ,,,,
Monday, 27 July 2009
चीत्कार भरी बाणी में धुन कैसे लाऊं ?(कविता)
आखिर ये भी बच्चे हैतुम कहते हो गीतों में,,,
अभिनन्दन दूँ ,,,
बाणी की मृदुल व्यंजना से ,,
वंदन दूँ ,,,,,
क्यों ह्रदय शूलता को,,,
नहीं समझते हो मित्रो ?
क्यों गहन मौनता को ,,
नहीं समझते हो मित्रो ?
जब ह्रदय वेदनाकुल हो ,
फिर गीतों को कैसे गाऊं?
जब चीत्कार भरी हो बाणी में ,,
फिर उसमे धुन कैसे लाऊं ?
जब अंतस में भास्मातुर,,,
ज्वाला हो ,,,,
जब लहू बन चुका क्रोधातुर,,
हाला हो ,,,
जब आँखों से केवल ,,
लपटे निकल रही हो ,,,
जब शब्दों में केवल ,,,
डपटे निकल रही हो ...
ऐसे जंगी मौसम में मैं ,,,
प्रेमातुर गीत नहीं गा सकता ,,,
इन युद्घ गर्जनाओं में मैं ,,,,
संगीत नहीं ला सकता ,,,
जब पीड़ित जन के आंसू ,,
मेरी बाणी का संबाद बने हो ,,
जब मेरे जीवन जीने का ,,
स्तम्भन भी अवसाद बने हो ,,,
जब शब्दों में दुखियारों का,,,
रुदन गूंजता हो ,,,,,
जब आँखों में बेचारों का,,,
सदन घूमता हो ,,,,
तब मैं प्रेमी पथ का ,,,
पथगामी कैसे बन जाऊं ,,,
तब मैं मानो मनुहारों का ,,,,
अनुगामी कैसे बन जाऊं ,,,
मैं कविता नहीं सुनाता ,,,
उनके आंसू रोता हूँ ,,,
वो पीते है जिनको पल पल,,,
मैं वो आंसू खोता हूँ ,,,,
घुट घुट जीते धरती पुत्रो की,,,
मैंने तंगी देखी है,,,
रोटी की गिनती करती ,,
तस्वीरे नंगी देखी है ,,,,
बचपन में बूढे होते बच्चो की ,,,
तकदीरे अधरंगी देखी है ,,,,
अब शब्द शब्द संजालो से ,,,
भर गीत कहाँ से लाऊं ,,,
जब ह्रदय वेदनाकुल है ,,,
फिर गीतों को कैसे गाऊं ,,,
अब तो मन करता है इनके रोने में ,,,
अपना क्रन्दन दूँ ,,,,
तब तुम कहते हो गीतों में,,,
अभिनन्दन दूँ,,,,