
प्रगति और प्रगतिशीलता का ,,
अवचेतन मन से ,,
तौल रहा था अपनी नीति,
संस्क्रती की अवनति,,
व्यवहारिकता के तराजू पर रख कर,,,
और बार बार उठा रहा था लान्छन,,,
अपने जमीर पर ,,
दे रहा था शाव्दिक गलियाँ ,,
अपनी नियति को ,,
हर बार दे रहा था पश्चिमता की दुहाई ,,
प्रगति की राह पर ,,
क्यों की कथित प्रगतिवादी जो हूँ ,,,
जड़ से कटना नहीं चाहता ,,
पर प्रगति जो करनी है ,,
नहीं खोना चाहता पहिचान को ,,
पर नयी पहिचान कैसे लूंगा ,,,
खुद को प्रगति वादी कैसे कहूंगा ,,
सम्पूर्णता और अपूर्णता के द्वंद में ..
अर्ध विछिप्त सा फिर रहा हूँ,,
पकड़ रखी है प्रगति की सीढ़ी ,,,
संस्क्रती और सभ्यता के जिस्म पर ,,
पैर रख कर,,,
दर्द है ,,
आँख भरी है ,,,
पर भावशून्य हूँ ,,,
6 comments:
बहुत सुन्दर सँपूर्ण और अपूर्ण ।प्रगति के इस दुाँद मे ही तोाज मनुश्य अपनीn सही राह नहीं देख पा रहा शायद उसे समझ भी आ रहा है कि वो विनाश की ओर जा रहा है मगर अपनी त्रश्णाओं को छोड नहीं पा रहा और दुविशा मे आगे बढा जा रहा है बहुत सुन्दर कविता है बधाई और आशीर्वाद्
यह हमारे देश की विडंबना है की आज की वर्तमान पीढ़ी इसे ही प्रगती कहती है.
बेहद उम्दा विचार,
प्रेरणा देती हुई...बेहतरीन कविता..
प्रगति तो हर देशकाल, हर समाज की मूलभूत आवश्यकता है. पर निरपेक्ष प्रगति ही स्वीकार्य होनी चाहिये. पश्चिमी, उत्तरी, दक्षिणी या पूर्वी नही. प्रगतिवादी कहलाने के लिये पश्चिमी संस्कृति को अपनाना उचित नही है. हाँ, अपने परिवेश की अगर माँग है तो यह कही से भी आयातित करने मे गुरेज नही करना चाहिये यह पश्चिमी भी हो सकता है. (यह मेरी मान्यता है)
आपकी यह रचना उत्कृष्ट कोटि की है. (यह भी मेरी मान्यता है)
यह उलझन ..यह कशमकश ... हर इंसान के साथ है ..
सुन्दर और भावपूर्ण रचना ..!!
good very good praveen ji bahut accha
Shrimaan apni jadon se kaoun kambakhat katnaa chahtaa hai.
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