पैसा बहुत महत्व पूर्ण चीज है ,, पर उसकी महत्वता व्यक्ति व्यक्ति पर निर्भर है किसी के लिए किसी राशि का होना न होना बराबर है और किसी के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि मैं ने गाँव के आम जन के जीवन को बहुत नजदीक से देखा है एक एक पैसा उनके लिए कितना महत्व पूर्ण है ,, इसे मैंने अनुभव किया है ,,,आज भी गाँव मेंकितने कम पैसे में इतनी अधिक चीज मिल जाती है जिसकी हम शहर में कल्पना ही कर सकते है ,,, क्यूँ ही न ये उनकी बिपन्नता के कारण हो इस कविता में मैंने आम जन की या कह सकते हो ग्रामीण आम जन की पैसे की उपयोगता और उपलब्धता को दर्शाया है
एक अठन्नी उछली तो ,, आकर गिरी हाथ में मेरे ,,, विस्मित हो मैंने देखा,, और चौक पड़ा,,,, हाय अठन्नी के इतने चेहरे,, मै कुछ कहता तब तक .. वो बोली ,,,, मै कागज का फुर फुर पंखा ,, शक्कर के दो कम्पट हूँ ,,, मै रोरी की पुड़िया,,, और गंगा का सम्पट हूँ ,,,, मै धनिये की गाडिया,,,, अदरक की गांठी ,,, मिर्चे की तीखी ,,, फलिया हूँ .... मै खडिये का डेला मुल्तानी मिट्टी,,, पडूये की डलिया हूँ ,,,, मै पेन की निव,,, हूँ पेन की स्याही और चौपतिया हूँ ,,, मै कपूर का टुकडा फूलो की माला और ,, घी की बत्तिया हूँ ,,, अब मै विस्मित था ,,, सुनता जाता था उसकी बोली ,,, कुछ कहता इससे पहले ,,, वो उछली और उसकी होली ,,, मै हतप्रभ था ,,, अब कुछ नहीं था हाथ में मेरे बस सोच रहा था ,, हाय अठन्नी के इतने चेहरे एक अठन्नी उछली तो ,, आकर गिरी हाथ में मेरे ,,,
मै कागज का फुर फुर पंखा प्रवीन जी! कितना कुछ कहा है आपने चन्द शब्दो के बेहतरीन तारतम्य मे. शायद; मै गरीब की चिट्ठी हूँ मै मुल्तानी मिट्टी हूँ बेहतरीन रचना
मेरा नाम प्रवीण शुक्ल है लिखना मेरी आदत है और मैं अन्तरमन के अनुभव और सामाजिक समस्याओ के बारे में लिखता हूँ मुझे नहीं पता की मैं कैसा लिखता हूँ न ही मैंने कभी किसी अखबार या पत्रिका में इसे छ्पबाने का प्रयाश किया मैं ये सब अपने अंतर्मन की ख़ुशी के लिए लिखता हूँ पर एक दिन मुझे लगा की की मैं जो लिखता हूँ अगर उस पर और लोगो की राय ले ली जाए तो कैसा रहेगा दर अशल येसा विचार मेरे मन तब आया जब मैं देश के बारे में कुछ करने की सोच रहा था देश भक्ति की भावना भी मेरे मन में बहुत प्रबल है और मुझे लगता है की हम अगर लाखो बार जनम ले कर भी देश के लिए अपनी जान निछाबर करे फिर भी हम देश के कर्ज से मुक्त नहीं हो सकते है , तो मैंने सोचा की अगर मेरी कविताओं से मेरे विचारो से लोगी को जरा भी देश भक्ति की प्रेरणा मिले तो मेरा लिखना धन्य हो जाए गा बस इसी विचार केपरिणाम स्वरूप ये ब्लॉग आप के सामने प्रस्तुत हैपढिये और आप को कैसा लगा अपनी राय जरुर बताईये आप मुझे मेल कर सकते है मेरी इ मेल आई डी है PRAVEENSHUKLA455@GMAIL.COM आप मुझे फोन भी कर सकते है आप की प्रति क्रिया से मुझे लिखने का हौसला मिले गा मेरा नंबर है 8527596234धन्यबाद
मैं पंछी इस अनंत जीवन व्योम का ,
समरसता का पुजारी नेह का अनुरागी हूँ .
चाहता नित नवीनता इस स्रस्ति में ,
करता हूँ दर्शन ब्रह्म का नित ब्रह्म में ,
आधियाँ अनगिनत है झेली इन बाजुओ से ,
स्थर है जो विचलित न हो वो आगी हूँ ,
समानता मेरी तू क्या कभी कर सकेगा
व्योम की विशालता क्या कभी हर सकेगा
मत हास कर सत्य का करले तू बोध ,
ब्रह्म जीव एक है इस का मैं भागी हूँ ,,,
चला कोटि कोटि दूरिया इस जीवन की ,
झेली कोटि कोटि शूरिया इस अरी मन की ,
इस कुटिलता से विमुख ब्रह्म के सम्मुख ,
मय में डूबता उछरता नवीन वैरागी
हूँ ,,,
मत स्रस्ति का आधार मुझको मान ले तू
सुक्ष्म बिंदु इस धरा का जान ले
तू ,,,,,,
कितने पुरुष महा पुरुष हो चुके
निज आभा खो चुके जगाने आया वो
त्यागी हूँ ,,,
मान ले मन में जान ले ठान ले मन में
विचलित न होना तुझको इस गगन में
आरी कंटको को बांध निज नैया बना
सोच ले वैभव मय जगत में बागी हू
7 comments:
बेहतरीन...हाय अठन्नी...बहुत उम्दा ख्याल प्रस्तुत किए.
मै कागज का फुर
फुर पंखा
प्रवीन जी! कितना कुछ कहा है आपने चन्द शब्दो के बेहतरीन तारतम्य मे.
शायद;
मै गरीब की चिट्ठी हूँ
मै मुल्तानी मिट्टी हूँ
बेहतरीन रचना
बढिया चिंतन .. बेहतरीन प्रस्तुति !!
बेहतरीन. रचना बधाई।
कमाल की महिमा बताई है पैसों की आपने.... सच मच अंत में ये हाथों से उचल जाती है ......... लाजवाब लिखा है
हूँ पेन की स्याही और चौपतिया हूँ ,,,
मै कपूर का टुकडा
फूलो
की माला और ,,
घी की बत्तिया हूँ ,,,
उम्दा प्रस्तुति
लाजवाब रचना बधाई।
achchhi likhi hai aap ki ye kavita
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