
बेहोशी के मीठे पल में,,
मैं शून्य क्षितिज में फिरता था ,,,
हिम गिरी की उचाई चढ़ता था,,
फिर सागर में गिरता था ,,
कौतुक विस्मय हो लोगो को ,,
अपलक निश्चल देखे जाता था ,,
कर्तव्य विमूढ़ हो उनकी इस ,,
चंचलता को लिया करता था ,,
फिर हो सकेंद्रित निज की ,,
मस्ती में ही तो जिया करता था ,,
प्रीत और प्रेम को अनायश ही,,
खेता था,,
नीरश इन रागों में रस्वादन लेता था ,,
माधुर्य और माधुरी की ,,,
एक प्रथक कल्पना थी मेरे मन में ,,
इन वेढ़न्गों से अलग,,
वाशना थी मेरे मन में ,,
कभी प्रेम की व्याकुलता को ,,
मैंने महसूश नहीं क्या था,,
कभी ह्रदय की दुर्वलता को ,,
मैंने महसूश नहीं क्या था ,,
सौन्दर्य वशन इस धरती का ,,
मेरा प्रेमांगन था ,,
ऋतुओ का परिवर्तन ही ,,
मेरा प्रेमालिंगन था ,,
हर शर्द किन्तु चौमुखी हवा,,
मुझको हर्षित करती थी ,,,
सूरज की एक एक किरणे ,,
उल्लासो से भरती थी ,,,
बस नया प्रेम अब खोज रहा हूँ ,,
वो सब भूल भूला के ,,,
छेड़ रहा हूँ नयी तान ,,
रागों में खुद को मिला के ,,,
6 comments:
बहुत सुन्दर कवित के लिये बहुत बहुत बधाइ ये शब्दों की सुरताल यौऔँ ही चलती रहे
sundar abhiwyakti
sundar abhiwyakti
kya baat hai praveen ji bahut accha likhte hai aap .kuch pyaar ke bare me likhe kuch waqt ke bare me likhe to bahut khushi hogi
sukriya nirmla ji houshla bdhane ke liye aap isi tarah se likhne ki prerna deti rahegi ye ummid hai o
om ji aap ka bhut bahut sukriya
devdash ji jarur likhunga aur bhi rito ke bare me aur maine likha bhi hai aap mere isi blog par aur bhi kavitaye dekh sakte hai
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