
बोझिल नैनों से नीद उडी है ,,
आँखों की चौखट पर महबूब कड़ी है ,,
अपलक अपलक ठगी लखे,,,
झर झर झर झर नीर वहे,,,
यादो के आगोसो की बर्षा,,,
करना प्रिये अभी रात पड़ी है ,,,
बोझिल नैनों से नीद उडी है ,,
आओ प्रिये मैं अमृत घोलूं ,,,
अकटक अविचल तेरा होलूं ,,
निजता की इस मधुमय वेला में,,,
क्यों रूठी रूठी दूर कड़ी है ,,,
बोझिल नैनों से नीद उडी है ,,
आगोसो में आ एक लाक हो जा ,,,
मैं तुझमे तू मुझमे खो जा ,,,
मैं तेरा तू मेरी हो जा,,,,
आओ अब प्यास बढ़ी है ,,,,
बोझिल नैनों से नीद उडी है ,,
संगीतो की साँझ सजा दो....
मुखरित कर दो गालो की लाली ,,
लव से लव तुम टकरा दो ,,,
मिलने की अब चाह बढ़ी है ,,,
बोझिल नैनों से नीद उडी है ,,
अपना ये कौमार्य मिटा दो ,,,
निज को तुम अब सुरभित कर लो ,,,
मुझको तुम बाँहों में भर लो ,,
मिटने की अब तड़प बढ़ी है ,,,
बोझिल नैनों से नीद उडी है ,,
प्रवीण पथिक
9971969084
1 comment:
श्रृंगार रस से भरी हुई
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