
उठता है गिरता है ,,,,
फिर लेता है करुना मिश्रित साँस,,
हे मदिरा देवी कितना कलुषित है है तेरा हास ,,,
अंतस से अंतस में कुंठित होता है ,,
चेतन मन का चेतन खोता है ,,
पल पल अपनी गाथा गाता ,,
तेरे मद में डूबा जाता ,,,
पल पल उसका भीषक होता ,,,
फिर भी न धारिता खोता ,,,
लाखो चुम्बन देता इस अबनी को ,,
निज कदमो की घबराहट से ,,
मानो प्रेमी आलिंगन करता हो निज सजनी को ,,
सब भाव शून्य सब ज्ञान शून्य ,,,
अपनी मस्ती में मस्त अहो ,,
अपना खो कर के जो झूमे,,
है येसा ज्ञानी कौन कहो ,,,
सव सौन्दर्य विलाशित जीवन को ,,
दे दी है उसने तिलांजलि ,,,
इस माया माय स्रष्टि से हट कर के ,,
ले ली है मधु की एक अन्जली ,,
भाता है उसको अपना जीना ,,
गर्वित है उसका सीना ,,
कर्तव्य परायण हे रसिक प्रिये ,,
फिरते हो कैसा व्रत कठिन लिए ,,
सब साम्राज्य तुम्हें त्रण तिनका है ,,,
उन्हें समर्पित वह जिनका है ,,,
करता है श्रम नित दिन वासर ,,
लेता न कभी विश्राम अहो ,,,,
अपना खोकर के जो झूमे ,,येसा ज्ञानी कौन कहो ,,
फिर लेता है करुना मिश्रित साँस,,
हे मदिरा देवी कितना कलुषित है है तेरा हास ,,,
अंतस से अंतस में कुंठित होता है ,,
चेतन मन का चेतन खोता है ,,
पल पल अपनी गाथा गाता ,,
तेरे मद में डूबा जाता ,,,
पल पल उसका भीषक होता ,,,
फिर भी न धारिता खोता ,,,
लाखो चुम्बन देता इस अबनी को ,,
निज कदमो की घबराहट से ,,
मानो प्रेमी आलिंगन करता हो निज सजनी को ,,
सब भाव शून्य सब ज्ञान शून्य ,,,
अपनी मस्ती में मस्त अहो ,,
अपना खो कर के जो झूमे,,
है येसा ज्ञानी कौन कहो ,,,
सव सौन्दर्य विलाशित जीवन को ,,
दे दी है उसने तिलांजलि ,,,
इस माया माय स्रष्टि से हट कर के ,,
ले ली है मधु की एक अन्जली ,,
भाता है उसको अपना जीना ,,
गर्वित है उसका सीना ,,
कर्तव्य परायण हे रसिक प्रिये ,,
फिरते हो कैसा व्रत कठिन लिए ,,
सब साम्राज्य तुम्हें त्रण तिनका है ,,,
उन्हें समर्पित वह जिनका है ,,,
करता है श्रम नित दिन वासर ,,
लेता न कभी विश्राम अहो ,,,,
अपना खोकर के जो झूमे ,,येसा ज्ञानी कौन कहो ,,
7 comments:
बढिया है....लिखते रहें
एकदम सत्य उकेरा है इस रचना में..
बहुत सटीक .. बहुत सुंदर .. बधाई एवं शुभकामनाएं !!
कल्पना की एक सच्ची उड़ान
इसे कहते हैं ढलती चढ़ान।
िअपना खो कर के जो झूमे ऐसा ग्यानी---- प्रवीण तुम्हारी रचनाओं मे यहाँ संवेदनायें होती हैं वहा वो जीवन के सकारात्मक पक्ष को भी प्राप्त होती हैं और ये तुम्हारे व्यक्तित्व और भावनाओम का सुन्दर शब्दों मे संयोजन मुझे हमेशा प्रभावित करता है बहुत सुन्दर रचना बधाई और आशीर्वाद्
praveen ji
namaskar
deri se aane ke liye kshma ...
aapki rachnao me jo ek baat mujhe baut pasand hai wo hai ...aapki hindi .. itni uccha hindi ko mera salaam
aapki lekhni ko bhi mera salaam..
kavita me ek sacchai hai ..jo ki ingit karti hai ki apna sab kuch kaise kho jaaya jaata hai ...
ek bahut hi philosphical approch hai is rachna me ..
praveen bhai , ab delhi aakar milna hi honga yaar..
badhai hi badhai
aap ki rachna satya ka darshan karati hai
bhut hi satik rachna
badhai
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