Wednesday, 26 May 2010

मुस्करा के बोले फिर मिलने की है आरजू अच्छा लगा ,,,,

जब उन्होंने फिर मोहब्बत से की गुफ्तगू अच्छा लगा ,,,,
मुस्करा के बोले फिर मिलने की है आरजू अच्छा लगा ,,,,
हम तो तनहा बड़ी कशमकश-ओ -वहिशत में जी रहे थे,,,
उन्होंने किया प्यार का नया सिलशिला शुरू अच्छा लगा,,,
हम मदहोश होते रहे की ये शहर ऐ गुल की है मस्ती ,,,,
जब तूने कहा ये जुल्फ ऐ शबरंग का जादू अच्छा लगा ,,,,
हम तो अपना हाल -ऐ - दिल सुनाने को वेइन्तहा बेकरार थे ,,,
बड़ी साफगोई से तेरा ये नजरे चुराना यूँ अच्छा लगा,,
अब तो फ़स्ल-ऐ बहार भी बे नूर बदरंग सी लगती है,,,
फिर यादो में आगई तेरे अहसाश की खुशबू अच्छा लगा ,,
मायूश हूँ अबकी खिजा तक शायद जिन्दा न रह पाउँगा ,,,
जब से सुना उनको कब्र देखने की है जुस्तजू अच्छा लगा ,,,,
,

9 comments:

विनोद कुमार पांडेय said...

aapko achcha laga par hamko bahut hi achcha laga..gazal padh kar.

राजेन्द्र मीणा said...

मायूश हूँ अबकी खिजा तक शायद जिन्दा न रह पाउँगा ,,,
जब से सुना उनको कब्र देखने की है जुस्तजू अच्छा लगा ,

शानदार ग़ज़ल है ...पढ़ते ही मुहं से ..वाह! वाह ! निकल गया .....जीतनी तारीफ़ करो कम ही होगी

बालमुकुन्द अग्रवाल,पेंड्रा said...

"बहुत दिनों बाद मासूम सी गजल पढी.गर्मी की तपिश में दिल को करार आया.बहुत अच्छा लगा."

अरुणेश मिश्र said...

प्रशंसनीय ।

sangeeta swarup said...

खूबसूरत गज़ल...

यहाँ आना हमें अच्छा लगा..

arun c roy said...

जब उन्होंने फिर मोहब्बत से की गुफ्तगू अच्छा लगा ,,,,
मुस्करा के बोले फिर मिलने की है आरजू अच्छा लगा ,,,,
हमे भी आपकी ग़ज़ल अच्छा लगा !

Vivek Jain said...

वाह
vivj2000.blogspot.com

रचना दीक्षित said...

आज पहली बार आना हुआ पर आना सफल हुआ देर से आने का दुःख भी बेहद प्रभावशाली प्रस्तुति किस किस बात की तारीफ करूँ बस बेमिसाल..... लाजवाब.......

bhavnayen said...

praveen bahut hi achi rachna dard liye hue isko padhna hume bahut acha laga