Saturday, 19 December 2009

हौसिला कितना तड़फने का देख तेरे बिस्मिल में है ।।


आज देश की महान हुतात्मा राम प्रसाद बिस्मिल का शहीद दिवश है तो इस छोटी पोस्ट में पेश इसी महान आत्मा द्वारा लिखित अंतिम नोट

देखना है किस कदर दम खंजरे कातिल में है।

अब भी यह अरमान यह हसरत दिले बिस्मिल में है ।।

गैर के आगे न पूछो इस में है एक खास राज ।

फिर बता देंगे तुम्हें जो कुछ हमारे दिल में है ।।

खींच कर लाई है सबको कत्ल होने की उमीद ।

आशिकों का आज जमघट कूचये कातिल में है ।।

फिरते हो क्यों हाथ में चारों तरफ खंजर लिये ।

आज है यह क्या इरादा आज यह क्या दिल में है ।।

एक से करता नहीं क्यों दूसरा कुछ बातचीत ।

देखता हूं मैं जिसे वह चुप तेरी महफिल में है ।।

उन पर आफत आयेगी एक रोज मर ही जाये गे।

वह तो दुनिया में नहीं जो कूचये कातिल में है ।।

एक जानिब है मसीहा एक जानिब है कजा़ ।

किस कशामकश में पड़ी है जान किस मुश्किल में है ।।

जख्म खाकर भी उसे है जख्म खाने की हवश ।

हौसिला कितना तड़फने का देख तेरे बिस्मिल में है ।।





परमात्मा ने मेरी पुकार सुन ली और मेरी इच्छा पूरी होती दिखाई देती है । मैं तो अपना कार्य कर चुका । मैने मुसलमानों में से एक नवयुवक निकाल कर भारतवासियों को दिखला दिया, जो सब परीक्षाओं में पूर्णतया उत्तीर्ण हुआ । अब किसी को यह कहने का साहस न होना चाहिये कि मुसलमानों पर विश्वास न करना चाहिये । पहला तजर्बा था जो पूरी तौर से कामयाब हुआ ।

अब देशवासियों से यही प्रार्थना है कि यदि वे हम लोगों के फांसी पर चढ़ने से जरा भी दुखित हुए हों, तो उन्हें यही शिक्षा लेनी चाहिये कि हिन्दू-मुसलमान तथा सब राजनैतिक दल एक हो कर कांग्रेस को अपना प्रतिनिधि मानें । जो कांग्रेस तय करें, उसे सब पूरी तौर से मानें और उस पर अमल करें । ऐसा करने के बाद वह दिन बहुत दूर न होगा जब कि अंग्रेजी सरकार को भारतवासियों की मांग के सामने सिर झुकाना पड़े, और यदि ऐसा करेंगे तब तो स्वराज्य कुछ दूर नहीं । क्योंकि फिर तो भारतवासियों की मांग के सामने सिर झुकाना पड़े, और यदि ऐसा करेंगे तबतो स्वराज्य कुछ दूर नहीं । क्योंकि फिर तो भारतवासियों को काम करने का पूरा मौका मिल जावेगा ।

हिंदू-मुसलिम एकता ही हम लोगों की यादगार तथा अन्तिम इच्छा है, चाहे वह कितनी कठिनता से क्यों न हो । जो मैं कह राहा हूं वही श्री अशफ़ाक उल्ला खां बारसी का भी मत है, क्योंकि अपील के समय हम दोनों लखनउ जेल में फांसी की कोठरियों में आमने सामने कई दिन तक रहे थे । आपस में हर तरह की बातें हुई थी । गिरफतारी के बाद से हम लोगों की सजा पड़ने तक श्री अशफ़ाक उल्ला खां की बड़ी उत्कट इच्छा यही थी, कि वह एक बार मुझसे मिल लेते, जो परमात्मा ने पूरी कर दी ।

श्री अशफ़ाक उल्ला खां तो अंग्रेजी सरकार से दया प्रार्थना करने पर राजी ही न थे । उन का तो अटल विश्वास यही था कि खुदाबन्द करीम के अलावा किसी दूसरे से दया की प्रार्थना न करना चाहिय, परन्तु मेरे विशेष आग्रह से ही उन्होंने सरकार से दया प्रार्थना की थी । इसका दोषी मैं ही हूं, जो अपने प्रेम के पवित्र अधिकारों का उपयोग करके श्री अशफ़ाकउल्ला खां को उन के दृढ़ निश्चय से विचलित किया । मैंने एक पत्र द्वारा अपनी भूल स्वीकार करते हुए भ्रातृ द्वितीया के अवसर पर गोरखपुर जेल से श्री अशफ़ाक को पत्र लिख कर क्षमा प्रार्थना की थी । परमात्मा जाने कि वह पत्र उनके हाथों तक पहुंचा भी या नही, खैर !

परमात्मा की ऐसी ही इच्छा थी कि हम लोगों को फांसी दी जावे, भारतवासियों के जले हुये दिलों पर नमक पड़े, वे बिलबिला उठें और हमारी आत्मायें उन के कार्य को देख कर सुखी हों । जब हम नवीन शरीर धारण कर के देशसेवा में योग देने को उद्यत हों, उस समय तक भारतवर्श की राजनैतिक स्थिति पूर्णतया सुधरी हुई हो । जनसाधारण का अधिक भाग सुशिक्षित हो जावे । ग्रामीण लोग भी अपने कर्तव्य समझने लग जावें ।

प्रीवीकौंसिल में अपील भिजवा कर मैंने जो व्यर्थ का अपव्यय करवाया उसका भी एक विशेष अर्थ था । सब अपीलों का तात्पर्य यह था कि मृत्यु दण्ड उपयुक्त दण्ड नहीं । क्योंकि न जाने किस की गोली से आदमी मारा गया । अगर डकैती डालने की जिम्मेवारी के ख्याल से मृत्युदण्ड दिया गया तो चीफ कोर्ट के फैसले के अनुसार भी मैं ही डकैतियों का जिम्मेदार तथा नेता था, और प्रान्त का नेता भी मैं ही था अतएव मृत्यु दण्ड तो अकेला मुझे ही मिलना चाहिए था । अतः तीन को फांसी नहीं देना चाहिये था । इसके अतिरिक्त दूसरी सजायें सब स्वीकार होती । पर ऐसा क्यों होने लगा ?

मैं विलायती न्यायालय की भी परीक्षा कर के स्वदेशवासियों के लिए उदाहरण छोड़ना चाहता था, कि यदि कोई राजनैतिक अभियोग चले तो वे कभी भूल करके भी किसी अंग्रेजी अदालत का विश्वास न करें । तबियत आये तो जोरदार बयान दें । अन्यथा मेरी तो यही राय है कि अंग्रेजी अदालत के सामने न तो कभी कोई बयान दें और न कोई सफाई पेश करें । काकोरी षडयन्त्र के अभियोग से शिक्षा प्राप्त कर लें । इस अभियोग में सब प्रकार के उदाहरण मौजूद है ।

प्रीवीकौंसिल में अपील दाखिला कराने का एक विशेष अर्थ यह भी था कि मैं कुछ समय तक फांसी की तारीख हटवा कर यह परीक्षा करना चाहता था कि नवयुवकों में कितना दम है, और देशवासी कितनी सहायता दे सकते हैं । इस में मुझे बड़ी निराशा पूर्ण असफलता हुई । अन्त में मैने निश्चय किया था कि यदि हो सके तो जेल से निकल भागूँ । ऐसा हो जाने से सरकार को अन्य तीनों फांसी वालों की फांसी की सजा माफ कर देनी पड़ेगी, और यदि न करते तो मैं करा लेता ।

मैंने जेल से भागने के अनेकों प्रयत्न किए, किन्तु बाहर से कोई सहायता न मिल सकी यही तो हृदय पर आघात लगता है कि जिस देश में मैने इतना बड़ा क्रान्तिकारी आन्दोलन तथा षड़यन्त्रकारी दल खड़ा किया था, वहां से मुझे प्राणरक्षा के लिये एक रिवाल्वर तक न मिल सका । एक नवयुवक भी सहायता को न आ सका । अन्त में फांसी पा रहा हूं । फांसी पाने का मुझे कोई भी शोक नहीं क्योंकि मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं, कि परमात्मा को यही मंजूर था ।

मगर मैं नवयुवकों से भी नम्र निवेदन करता हूं कि जब तक भारतवासियों को अधिक संख्या सुशिक्षित न हो जाये, जब तक उन्हें कर्तव्य-अकर्तव्य का ज्ञान न जावे, तब तक वे भूल कर भी किसी प्रकार के क्रान्तिकारी षड़यन्त्रों में भाग न लें । यदि देशसेवा की इच्छा हो तो खुले आन्दोलनों द्वारा यथा्शक्ति कार्य करें अन्यथा उनका बलिदान उपयोगी न होगा । दूसरे प्रकार से इस से अधिक देशसेवा हो सकती है, जो अधिक उपयोगी सिद्ध हेागी ।

परिस्थिति अनुकूल न होने से ऐसे आन्दोलनों से अधिकतर परिश्रम व्यर्थ जाता है । जिनकी भलाई के लिये करो , वहीं बुरे-बुरे नाम धरते है, और अन्त में मन ही मन कुढ़-कुढ़ कर प्राण त्यागने पड़ते है ।
देशवासियों से यही अन्तिम विनय है कि जो कुछ करें, सब मिल कर करें, और सब देश की भलाई के लिये करें । इसी से सब का भला होगा, वत्स !

मरते बिस्मिल रोशन लहरी अशफ़ाक अत्याचार से ।
होंगे पैदा सैकड़ों इनके रूधिर की धार से ।।

रामप्रसाद बिस्मिल गोरखपुर डिस्टिक्ट जेल
१५ दिसम्बर १९२७

सभार

http://kakorikand.wordpress.com

लेखक:
रामप्रसाद ‘बिस्मिल‘
प्रकाशक:
भजनलाल बुकसेलर
सिन्ध
प्रथमवार] सन १९२७ [मूल्य २)

Saturday, 21 November 2009

अनावर्त मौन के झंझाव्रत में,,,


आज फिर देखना चाहता हूँ ,,
नीरवता कि तलहटी ,,
फिर चाहता हूँ फसना ,,
अनावर्त मौन के झंझाव्रत में,,,
लो बैठ गया हूँ वक्त कि कश्ती में,,,
घबडाहट और अन्मिलन का आनंद लिए ,,
अब उत्सुकता पूर्वक निहार रहा हूँ ,,,
अपने व्यक्तित्व की गहराई ,,,
जिसे समझने में ही रहा प्रयाश रत ,,
कुछ तीव्रता तो नहीं की मैंने ,,,
फिर उदिग्नता क्यूँ है ,,,
फिर क्यूँ नहीं मुखरित हो रही ,,
मेरी आंतरिक उर्जा ,,,
कुछ उकताहट सी हो रही है ,,,
व्यावहारिकता में व्य्पारिकता का मिलन ,,
असहनीय हो रहा है ,,,
धैर्य खो रहा है ,,,
बस चाहता हूँ उन्मुक्तता का निबारण,,
हटाना चाहता हूँ कलुषता का आबरण,,,
जिसे करसकू अमरत्व भरी म्रत्यु का बरण,,,
और बन सकू एक उदाहरण

Friday, 11 September 2009

शमा औकात में जले बेहतर है ,,(कविता)


जब जुगनुओ में सूरज की चमक हो ,,
तब शमा औकात में जले बेहतर है ,,
जब फुन्गियो पे दौड़ का ऐलान हो ,,
तब जहां हाथ पे चले बेहतर है ,,
जब बुजदिलो के हाथ में सरकार हो ,,,
जुल्म का प्रतिशोध न पले बेहतर है ,,
जब बासिंदों में रिहायस का टकराव हो ,,
बस्तिया हँसती-हँसाती मिले बेहतर है ,,,
जब मजहबो से भगवान् की पहिचान हो ,,
मिलना नहीं खुल कर गले बेहतर है ,,,

Thursday, 27 August 2009

क्यों की कथित प्रगति वादी जो हूँ ,,,,, (कविता)


कर रहा था आत्म मंथन ..
प्रगति और प्रगतिशीलता का ,,
अवचेतन मन से ,,
तौल रहा था अपनी नीति,
संस्क्रती की अवनति,,
व्यवहारिकता के तराजू पर रख कर,,,
और बार बार उठा रहा था लान्छन,,,
अपने जमीर पर ,,
दे रहा था शाव्दिक गलियाँ ,,

अपनी नियति को ,,

हर बार दे रहा था पश्चिमता की दुहाई ,,
प्रगति की राह पर ,,
क्यों की कथित प्रगतिवादी जो हूँ ,,,
जड़ से कटना नहीं चाहता ,,
पर प्रगति जो करनी है ,,

नहीं खोना चाहता पहिचान को ,,
पर नयी पहिचान कैसे लूंगा ,,,

खुद को प्रगति वादी कैसे कहूंगा ,,
सम्पूर्णता और अपूर्णता के द्वंद में ..

अर्ध विछिप्त सा फिर रहा हूँ,,
पकड़ रखी है प्रगति की सीढ़ी ,,,

संस्क्रती और सभ्यता के जिस्म पर ,,
पैर रख कर,,,
दर्द है ,,
आँख भरी है ,,,
पर भावशून्य हूँ ,,,

Friday, 21 August 2009

मै धन्य हो गया ,,,,,(कविता)



निरन्तर संकुचित होती ,,
अपनी भावनाओं को सकेंद्रित कर ,,,
परिवर्तन की राह की ओर ताकता हुआ ,,
आत्मनिरिक्षण कर रहा हूँ,,
निज परिक्षण कर रहा हूँ ,,,
कुछ उनीदी सी छा रही है ,,
पर चैतन्य हूँ ,,,
कर रहे है चेष्टा मार्ग अबरुद्ध करने की ,,,
मौन के विशाल बबंडर,,,,
आ रही है एक नयी चुनौती ,,
हर पग पर ,,
गम्भीरता को मैंने ओढ़ रक्खा है ,,
फिर भी विचल हूँ ,,
स्थर होने के प्रयत्न में भी ,,,
चल हूँ ,,,
विपरीत परिस्थितिया ,,
आकास्मिक आघात कर रही है ,,,,
विपन्ता निरन्तर घात कर रही है ,,,
पर निज का खुला पन ,,,
मिलन की राह तैयार कर रहा है ,,,
उस पर तेरा सम्बोधन ,,,
सम्मिलन की राह तैयार कर रहा है ,,,
तभी कुछ हवाओं सी सनसनाहट हुई ,,,
और मै विलुप्त हो गया ,,
अब तू ही है "मै " लुप्त हो गया ,,,
ओ अकिंचन दिव्यद्रष्टा ,,,
मै धन्य हो गया ,,,,,

Friday, 14 August 2009

दंगा (कविता)


एक चौराहा था , सुन्दर सा चौराहा ,,
चहकता हुआ चौराहा , महकता हुआ चौराहा ,,,
वहा उड़ती हुई पतंगे थी , घूमती हुई फिरंगे थी ....
सजती हुई मालाये थी,, लरजती हुई बालाये थी ,,,
चमकते चमड़े की दूकान थी,महकते केबडे की भी शान थी ,,
रफीक टेलर भी वही था , और हरी सेलर भी वही था ,,,
वहा पूरा हिन्दुस्तान था , हर घर और मकान था ,,
मेल मिलाप और भाई चारा था , कोई नहीं बेचारा था ,,
पर एक चीज वहा नहीं थी , जो न होना ही सही थी ,,
वहा नहीं था तो पुरम ,पुर और विहार नहीं था ...
वहा नहीं था तो दालान ,वालान और मारान नहीं था,,,
गली कासिम जान भी नहीं थी, और गली सीता राम भी नहीं थी ,,,,
वहा हिन्दू भी नहीं था , वहा मुसलमान भी नहीं था ,,
था तो केवल हिन्दुस्तान था , था तो केवल भारत महान था ,,
फिर एक आवाज आई मैं हिन्दू हूँ ,,
उसकी प्रतिध्वनी गूंजी मैं मुसलमान हूँ ,,,
और उस लय का गला घुट गया ,जो कह रही थी मैं हिन्दुस्तान हूँ ,,
सुनते ही सन्नाटा पसर गया ,,
उड़ते उड़ते हरी पतंग ने लाल पतंग मजहब पूछ लिया ,,
हरी ने रफीक के सीने में चाकू मार दिया ,,
सब्जियों में भी दंगा हो गया , अपना पन सरेआम नंगा हो गया ,,
बैगन ने आलू के कान में फुसफुसाया ,,मियां प्याज को पल्ले लगाओ ,,
कद्दू ने कुछ जायदा ही फुर्ती दिखाई,प्याज को लुढ़का दिया,,,
और वो पहिये के नीचे आ गया ,,
लहसुन ने मिर्ची को मसल दिया , क्यों की वो हिन्दू थी ,,
अब तो वहा पर कोहराम था ,क्यूँ की दंगा सरेआम था ,,
एक दूकान दूसरी दूकान से धर्म पूछ रही थी ,,
एक नुक्कड़ दूसरे नुक्कड़ से धर्म पूछ रहा था ,,
अब वहा पे वालान थे ,अब वहा पे मारान थे ,,
अब वहा पे पुरम था , अब वहा पे विहार भी था ,,
अगर कुछ नहीं था तो ,,
वहा पे हिन्दुस्तान नहीं था , मेरा भारत महान नहीं था ,,
अब वहा पर केवल हिन्दू था और मुसलमान था ,,
और वीरान ही वीरान था ,,
तभी किसी ने कहकहा लगाया और ताली बजाई ,,,
फिर उसने लम्बी साँस ली और ली अंगडाई,,
वो मुस्कराया क्यूँ की अब उसके मन का जहान था,,
फिर वह धीरे से बुदबुदाया मैं हिन्दू हूँ ,,
फिर वह धीरे से फुफुसाया , मैं मुसलमान हूँ ,,
और चल दिया अगले चौराहे पर,,
हिन्दुस्तान को हिन्दू और मुसलमान बनाने के लिए ,,
क्यों की यही तो उसका धर्म है और कर्म भी ,,
आखिर नेता जो है .....

Thursday, 13 August 2009

आ जा श्याम तोहे प्राण पुकारे ,(,कविता)


जा श्याम तोहे प्राण पुकारे ,,,

जा श्याम तेरी राह निहारे ,,,

नैना व्याकुल कारे कारे,,,

दे दो दर्शन मोहन प्यारे ,,,

प्यासा हूँ बस प्यास बुझा दो ,,,

मैं ना हूँ , हो राधे राधे ,,,

जीवन के अनमेल रसो से ..

द्वार पड़ा हूँ आन तिहारे ,,,

जा श्याम तोहे प्राण पुकारे ,,,

जा श्याम तेरी राह निहारे ,,,

तेरी बंसी की सुन्दर ताने ,,,

सुन कर तेरे मीठे गाने ,,,

सुध बुध खोऊ ध्यान लगाऊं ,,

पर किंचित चैना मैं ना पाऊं ,,,,

मिलने को बेसुध खडा हूँ ,,,

मधुमय मन के उजियारे ,,,

जा श्याम तोहे प्राण पुकारे ,,,

जा श्याम तेरी राह निहारे ,,,

वन वन तट तट मैं तो घूमूं,,,

पग पग तेरी पद रज चूमूं ,,,

नदनंदन जीवन धन ,,

मधु सूदन दिग्दर्शन ,,,

मुझसे अपना मिलन करा दे ,,,

हे यदुवर , हे मोहन प्यारे ,,,

जा श्याम तोहे प्राण पुकारे ,,,

जा श्याम तेरी राह निहारे ,,,

मैं अबनी तू बादल साजन ,,,

वर्षो वर्षो बन प्रेमाघन ,,,,

तन भीगे और मन भीगे ,,,

भीगे मेरा सारा जीवन ,,,

पथ पथ घूमा पथिक बना हूँ ,,

राह दिखा दो जसुमति प्यारे ...

जा श्याम तोहे प्राण पुकारे ,,,

जा श्याम तेरी राह निहारे ,,,

Monday, 10 August 2009

क्या मालुम था मेरा शोणित केवल पानी कहलायेगा (


aआज हमारे शहीदों के साथ क्या हो रहा है जिसे जब जो दिल में आता है बोल देता है ये सोचने का प्रयाश भी नही करता की उसके द्बारा बोले गए शब्द कहाँ पर लगते है आख़िर आप उनका सम्मान नही कर सकते तो अपमान तो ना करो , कभी कोई कहता है ये मुठ भेड़ग़लत है , कभी कोई कहता है अग़रशहीद नही होता तो घर पर (........) भी नही आता शहीदों की आत्मा जो कही पर जरुर होगी जब ये सब देखती होगी तो उन्हें कैसा महसूस होता होगा उसी दर्द को लिखने का प्रयाश किया है



क्या मालुम था मेरा शोणित ,,
केवल पानी कहलायेगा ,,,
क्या मालुम था जीवन अर्पण ,,
ओछा आँका जाएगा ,,,
क्या मालुम था मरने पर भी ,,
अपमानित होकर रोना होगा ,,,
मेरी विधवाओं को पल पल ,,,
दर्दो को ही ढोना होगा ....
क्या मालुम था बलिदानी किस्सा ,,
अखबारों मे खो जाएगा,,,
क्या मालुम था मेरा शोणित ,,

केवल पानी कहलायेगा ,,,

उंगली उठेगी बलिदानों पर ,,
ये सत्कार भला होगा ,,,
लहू अश्रु रोयेगा वो ,,,
जो बलिदानी चाल चला होगा ,,,
आग लगेगी सीने मे ,,,
रो आसूं पी जाएगा ,,,,
क्या मालुम था मेरा शोणित ,,

केवल पानी कहलायेगा ,,,

खूब भुनायेगे बलिदानों को ,,,
वो वोटो की खातिर ,,,
खूब सुनायेगे भाषण ,,,
वो नोटों की खातिर ,,,
नेताओं की साझ सजेगी ,,,
प्यासा सैनिक रह जाएगा ,,
क्या मालुम था मेरा शोणित ,,

केवल पानी कहलायेगा ,,,

क्या मालुम था वीरो का अर्पण ,,,
पैसे से तोला जायेगा ,,,
क्या मालुम था बलिदानों को ,,,
उपहासों मे बोला जाएगा,,,
धूल पड़ेगी तस्वीरों पर ,,,
कुछ मोल नहीं रह जायेगा ,,,,
क्या मालुम था मेरा शोणित ,,

केवल पानी कहलायेगा ,,,

क्या मालुम था जीवन अर्पण ,,

ओछा आँका जाएगा ,,,

Saturday, 8 August 2009

हाय अठन्नी के इतने चेहरे,, ,,{कविता}



पैसा बहुत महत्व पूर्ण चीज है ,, पर उसकी महत्वता व्यक्ति व्यक्ति पर निर्भर है किसी के लिए किसी राशि का होना न होना बराबर है और किसी के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि मैं ने गाँव के आम जन के जीवन को बहुत नजदीक से देखा है एक एक पैसा उनके लिए कितना महत्व पूर्ण है ,, इसे मैंने अनुभव किया है ,,,आज भी गाँव मेंकितने कम पैसे में इतनी अधिक चीज मिल जाती है जिसकी हम शहर में कल्पना ही कर सकते है ,,, क्यूँ ही न ये उनकी बिपन्नता के कारण हो इस कविता में मैंने आम जन की या कह सकते हो ग्रामीण आम जन की पैसे की उपयोगता और उपलब्धता को दर्शाया है




एक अठन्नी उछली तो ,,
आकर गिरी हाथ में मेरे
,,,
विस्मित हो मैंने देखा,,
और चौक पड़ा,,,,
हाय अठन्नी
के
इतने चेहरे,,
मै कुछ कहता तब तक ..
वो बोली ,,,,
मै कागज का फुर
फुर पंखा
,,
शक्कर के दो कम्पट हूँ ,,,
मै रोरी की पुड़िया,,,
और गंगा
का
सम्पट हूँ ,,,,
मै धनिये की गाडिया,,,,
अदरक की गांठी
,,,
मिर्चे की तीखी ,,,
फलिया हूँ ....
मै खडिये का डेला
मुल्तानी मिट्टी,,,
पडूये की डलिया हूँ ,,,,
मै पेन की
निव,,,
हूँ पेन की स्याही और चौपतिया हूँ ,,,
मै कपूर का टुकडा
फूलो
की माला और ,,
घी की बत्तिया हूँ ,,,
अब मै विस्मित था
,,,
सुनता जाता था
उसकी बोली ,,,
कुछ कहता इससे पहले ,,,
वो उछली और
उसकी होली ,,,
मै हतप्रभ
था ,,,
अब कुछ नहीं था हाथ में मेरे
बस
सोच रहा था ,,
हाय अठन्नी
के इतने चेहरे
एक अठन्नी उछली तो ,,
आकर गिरी हाथ में मेरे
,,,

Tuesday, 4 August 2009

जब तू ही ना है फिर तेरी यादे क्यूँ कर आती है ,, (कविता)


आज रच्छाबंधन का पावन पर्व है, और इस पावन पर्व पर बहनों की महत्ता समझ में आती है,बहन वो पावन नदी है स्वयम को तिरोहित कर देती है अपने भाई और उसके हित के लिए बहन दीपक की वह ज्योति है जो स्वम तो जलती है पर दीपक तक अग्नि को नहीं पहुचने देती है , बहन की महत्ता वह व्यक्ति समझ सकता है ,,जिसे बहन का प्यार मिला है , और वह भी जिसे नहीं मिला है ,, परिवर्तन प्रक्रति का नियम है और म्रत्यु परम सत्य इस सत्य ने मुझे भी मेरी बहन के प्यार से दूर किया , पर पुनरावर्ती भी भी प्रक्रति का एक अटल सत्य है, और इस सत्य ने मुझे मेरी खोई बहन मिला दी ,, इस अंतर्जाल की दुनिया में , जहाँ पर रिश्ते केवल मजाक भर है , पर भी मुझे मेरी बहन मिल सकती थी मैंने कभी नहीं सोचा था साधारण जान पहिचान से भाई बनने का जो सुख मैंने अनुभव किया अवर्णीय है , मुझे ऐसा प्रतीत हुआ की मुझे मेरी खोई हुई बहन मिल गयी है ,,, आज कितने समय के बाद राखी बाधूंगा मुझे नहीं पता , पर अनुभव कुछ खो कर पाने जैसा होगा , ये कविता मै अपनी इस बहन को समर्पित कर रहा हूँ




बहना तेरी बाते क्यूँ पल पल खूब सताती है .,,
जब तू ही ना है फिर तेरी यादे क्यूँ कर आती है ,,
क्यूँ तेरे हंसने की बोली मुझको खूब रुलाती है ,,
क्यों मेरे माथे की रोली आंसू भर ले आती है,,,
जब भी व्याकुल हो मै गीतों की सांझ सजाता हूँ ,,,
गीतों की धुन में भी बस तेरी यादो को ही पाता हूँ,,,
जब कभी वेदनामय हो दे आवाज बुलाता हूँ ,,,
तू ना आई फिर भी तेरे अहसासों को पाता हूँ ,,,
बहना हर राखी पर राखी तेरी याद दिलाती है ,,,
इस राखी की हर पाखी हर पल तुझे बुलाती है ,,,
बहना तेरी बाते क्यूँ पल पल खूब सताती है .,,
जब तू ही ना है फिर तेरी यादे क्यूँ कर आती है ,,
बहना तुझको आज बुलाते घर ,आँगन चौबारे है,,
दरवाजा ड्योढी चौका छत व्यथित सभी बेचारे है ,,,
मंदिर की ज्योति भी बहना अब टीम-२ कर ही जलती है,,,
मानो तेरी यादो की धुन में, हर पल आहे भरती है,,,
बहना तेरी तस्वीरों को संदूकों में खूब सहेजा है,,,
सब यादो को खूब सहेजा है सब वादों को खूब सहेजा है ,,
जब पवनी से हिलती घंटी,मानो तू इठलाती है ,,,
जब मेघो में छिपती बिजली ,मानो तू शर्माती है,,,
बहना तेरी बाते क्यूँ पल पल , खूब सताती है .,,
जब तू ही ना है फिर तेरी यादे ,क्यूँ कर आती है ,,
बहना बाबू की रोती आँखे तूने ना देखि, पर वो रोते है ,,
तेरी यादो के लम्हों को पल पल वो, आंसूं बन धोते है ,,
जब से तू ना है पुस्तक बेकार पड़ीं है ,कैरम बेकार पड़ा है ,,
माँ की ढोलक भी बेजार पड़ी है ,,बेकार गिटार पड़ा है,,
माँ तो पूजा में भी , अब तेरी यादो में रोती है ,,
उसकी हर पूजा में बस तेरी यादे होती है,,
हर दिन माँ तेरी सारी चीजे, ला मुझे दिखाती है ,,,
कहती है तू आने को है ,, मुझसे सब सम्भलाती है,,,
बहना तेरी बाते क्यूँ पल पल , खूब सताती है .,,
जब तू ही ना है फिर तेरी यादे ,क्यूँ कर आती है ,,

Friday, 31 July 2009

फिर क्यूँ तुमने की ठिठोली ? (कविता)


मैंने कब कहा तुम मुझे ,,,,
अपने समानान्तर खड़ा करो दो,,,
मेरा जीवन खुशियों से भर दो .,,,,
आरक्षण की बोली भी ,,,,
मैंने नहीं बोली ,,,,,
फिर क्यूँ तुमने की ठिठोली ?
जाति और उपजाति के नाम पर,,,
आरक्षण देकर ,,,,
शायद इससे तुम्हारी राज नैतिक रोटियाँ,,
सिकती है,,,,
इन मुद्दों से ही तो राजनीति की गोटियाँ ,,,
बिछती है ,,,,
नहीं आबश्यकता मुझे अनुदानों की ,,,
नहीं आबश्यकता मुझे सम्मानों की ,,,
जनतंत्र गणतंत्र प्रजातंत्र ,,,,
का अर्थ मैं नहीं जानता,,,
और ना ही मांगी मैंने कभी ,,,
राहत राशि या राहत सामग्री ,,,
मुझे तो बर्षा चाहिए,,,
जो कि अब नहीं होगी,,,,
अब तुम चाहे सूखा ग्रस्त घोषित करो,,,
या फिर अकाल ग्रस्त ,,,,
अब चाहे तुम खुद के बजट के पैसे खाओ ,,,
या फिर केंद्र कि राहत भी उड़ा जाओ ,,,,
मुझे तो विपन्नता में ही जीना है ,,,
पानी नहीं आसूं ही पीना है,,,
मुझे मालुम है इस बार ,,,
मुन्ने के लिए जूते नहीं ला सकूँगा ,,,
बाबू का कुर्ता भी नहीं सिलबा सकूँगा ,,,
कहाँ से आएगी मुन्ना कि मां के लिए ,,,
चौडी किनारे वाली साड़ी ,,,
और विजुरिया का गौना भी तो नहीं हो पायेगा ,,,
क्यों कि इस बार धान नहीं होगा ,,,
फिर भी मुद्रा स्फीति कि दर बढेगी ,,,
सरकार प्रगति और प्रगति करेगी ,,,.
और खूब अनुदान बांटेगी,,,
सूखा आपदा राहत के नाम पर,,,
भले ही अखबारों में ही ,,,,
क्यों कि उसे वोट जो चाहिए ,,,
हो सकता है इस बार पड़ जाए ,,,
खाने के भी लाले,,,
पर मैं हार नहीं मानूगा,,,,
खून और किडनी भी नहीं बेचूंगा ,,,,
भले ही शहर कि झुग्गियों में रहना पड़े ,,,,
रह लूँगा ,,,,
जिल्लत और बदहाली में जीना पड़े,,,,,
तो जी लूँगा,,,
क्यों कि पेट जो भरना है ,,,,
कभी स्वेच्छा से आन्दोलन और प्रतिवाद ,,,
भी नहीं करूँगा,,,
यूँ जीते हुए भी तिल तिल मरूँगा ,,,,
क्यों कि यही तो,,,,,
मेरी नियति है,,,

Wednesday, 29 July 2009

तुम रथी मुझे अर्थी बना लो ,,,(कविता)


शिकायत करती मेरी अंतरात्मा की आवाज




किस द्वंद में फसा दिया ,,,
किस फंद में गिरा दिया ,,,,
एक बूंद से त्रस्त था ,,,,
सागर में डुबा दिया ,,,,
अब कौतुक कर ,,,
उसे निहरता है ,,,,
ह्रदय पट चीर के,,,,
विहरता है,,,,
अदभुद की कभी ,,,
आकान्क्षा नहीं की,,,,
असीम की कभी ,,,
लालसा नहीं की ,,,
फिर भी ऐसा अबरोध,,
इतना बिरोध ,,,,
क्यूँ इतना क्रोध ,,,,
नहीं है इतना बोध ,,,
क्यूँ कटुता लिए हो ,,,
क्यूँ शत्रु किये हो ,,,,
क्यूँ नहीं निकलने देते,,,

इस अनित्य जग के बंधन से ,,,
क्यूँ मुक्त नहीं होने देते ,,,
इस मय के क्रन्दन से ,,,
क्यूँ नहीं होने देते,,,
गम्य में अगम्य का भान ,,,
अंतस में मय का ज्ञान .....
बंधन तोड़ एकी कार कर दो,,,,
निज का सारथी बना दो ,,,,
तुम रथी मुझे अर्थी बना लो ,,,
किस चक्र में कसा दिया ,,,
किस द्वंद में फसा दिया ,,,
किस फंद में गिरा दिया
,,,,

Monday, 27 July 2009

चीत्कार भरी बाणी में धुन कैसे लाऊं ?(कविता)

आखिर ये भी बच्चे है



तुम कहते हो गीतों में,,,
अभिनन्दन दूँ ,,,
बाणी की मृदुल व्यंजना से ,,
वंदन दूँ ,,,,,
क्यों ह्रदय शूलता को,,,
नहीं समझते हो मित्रो ?
क्यों गहन मौनता को ,,
नहीं समझते हो मित्रो ?
जब ह्रदय वेदनाकुल हो ,
फिर गीतों को कैसे गाऊं?
जब चीत्कार भरी हो बाणी में ,,
फिर उसमे धुन कैसे लाऊं ?
जब अंतस में भास्मातुर,,,
ज्वाला हो ,,,,
जब लहू बन चुका क्रोधातुर,,
हाला हो ,,,
जब आँखों से केवल ,,
लपटे निकल रही हो ,,,
जब शब्दों में केवल ,,,
डपटे निकल रही हो ...
ऐसे जंगी मौसम में मैं ,,,
प्रेमातुर गीत नहीं गा सकता ,,,
इन युद्घ गर्जनाओं में मैं ,,,,
संगीत नहीं ला सकता ,,,
जब पीड़ित जन के आंसू ,,
मेरी बाणी का संबाद बने हो ,,
जब मेरे जीवन जीने का ,,
स्तम्भन भी अवसाद बने हो ,,,
जब शब्दों में दुखियारों का,,,
रुदन गूंजता हो ,,,,,
जब आँखों में बेचारों का,,,
सदन घूमता हो ,,,,
तब मैं प्रेमी पथ का ,,,
पथगामी कैसे बन जाऊं ,,,
तब मैं मानो मनुहारों का ,,,,
अनुगामी कैसे बन जाऊं ,,,
मैं कविता नहीं सुनाता ,,,
उनके आंसू रोता हूँ ,,,
वो पीते है जिनको पल पल,,,
मैं वो आंसू खोता हूँ ,,,,
घुट घुट जीते धरती पुत्रो की,,,
मैंने तंगी देखी है,,,
रोटी की गिनती करती ,,
तस्वीरे नंगी देखी है ,,,,
बचपन में बूढे होते बच्चो की ,,,
तकदीरे अधरंगी देखी है ,,,,
अब शब्द शब्द संजालो से ,,,
भर गीत कहाँ से लाऊं ,,,
जब ह्रदय वेदनाकुल है ,,,
फिर गीतों को कैसे गाऊं ,,,
अब तो मन करता है इनके रोने में ,,,
अपना क्रन्दन दूँ ,,,,
तब तुम कहते हो गीतों में,,,
अभिनन्दन दूँ,,,,

Friday, 24 July 2009

कभी याद आऊ तो केवल दो आँशू टपका देना ,,,(कविता)


माँ अगर चाहती मेरी शादी हो ,,,
रण भूमि की मिटटी से,,
सुन्दर सा घर बनबा देना ,,,
हर कोने पर अरी मुंडो की,,
मालाये लटक रही हो,,
आँगन में संग्रामो की ,,
ज्वालाये धधक रही हो ,,,
गीतों की लय पे माँ तुम ,,
रण भेरी बजवा देना,,,
हर कोने में वीर लड़ाके हो,,
घर को तुम सजवा देना ,,,
मरू भूमि की वेदी हो ,,
बलिदानों की अहुतिया,,,,
बलि वेदी दुल्हन हो और हो,,
बलिदानी चोला ,
श्रंगारी कपड़ो की नहीं जरुरत ,,,
एक कफ़न तुम मँगवा देना ,,,,
माँ सीमा पर मरने वाले सारे मेरे,,
बाराती हो ...
रास्ट्र भूमि की बलिवेदी पर बलि दे जो ,
सो मेरे साथी हो ,,
माँ मेरी अगवानी वही करे,,,,
जिसके बोलो में हो धरती का बोला ,,,
सम्मानों को वही बढे,,,
जिसने पहना हो वीरो का चोला,,,
माँ पंडित की नहीं जरुरत ,,,
कोई वीर बुला देना,,,
शादी मंत्रो की बोली में माँ,,,
जन गण मन तुम गा देना ,,,,
सात पदों की सातो इच्छा ,,
एक ही में ले लूँगा ,,,
मात्र भूमि पे हो निछावर ,,,
सौ सौ जन्म मैं दे दूंगा ,,,
हुंकारों की भाषा में ,,,
माँ शादी गीतों को गाना ,,,
ललकारो की भाषा में ही ,,,
थोरी सी लय लाना ,,,
माँ नहीं पालकी का लालच मुझको ,,,
अर्थी तुम मँगवा देना ,,,
हर कोने पर माँ वीरो को लगवा देना ,,,
चन्दन श्रंगारो का आलेप नहीं,,
थोरी मिटटी मलवा देना ,,,
माँ गंगा जल नहीं चाहिए ,,,
दो आंशू तुम ला देना ,,,
मुझको अग्नि वही लगाये ,,
जो वीरो की टोली से हो ,,,
अग्नि प्रज्वल्लित भी माँ केवल,,,
वीरो की गोली से हो,,,
म्रत्यु पाठ भी वही करे,,
जिसकी बोली में हुंकारे हो ,,,
म्रत्यु पाठ के गीतों में ,,,
माँ केवल ललकारे हो ,,,
नहीं प्रवाहित करना अस्थि को ,,
गंगा या यमुना जल में ,,,
वीर गुजरते हो जिस पथ से ,,,
बिखरा देना उस थल में ,,,
माँ कभी विलापो की बोली में ,,,
ना मुझको तुम ला देना ,,,,
कभी याद आऊ तो केवल ,,
दो आँशू टपका देना ,,,
माँ एक प्राथना और करूँगा ,,,
तेरा हर बेटा उन्मादी हो ,,,
रास्ट्र भूमि पर बलि बलि जाए ,,
ऐसी ही उसकी शादी हो ,,,
माँ अगर चाहती मेरी शादी हो ,,,,,

Wednesday, 22 July 2009

दानो की भाषा में अब और दिलासा नहीं चाहिए ||,,(कविता)


चाचा मामा ताऊ अंकल हो चाची ताई आंटी ,,

रिस्तो की यैसी परिभाषा नहीं चाहिए ,,

विद्यालय स्कूल बने विद्या एजूकेशन ,,,
पावन शब्दों में येसी भाषा नहीं चाहिए ,,,
लेड उगल दे धरती और सांसो में co2 हो ,,

प्रगति की यैसी आशा नहीं चाहिए ,,,,

हर सर को छत और हर हाथो को काम मिले ,,

दानो की भाषा में अब और दिलासा नहीं चाहिए ,,

संस्क्रति की हो चिंदी चिंदी और सभ्यता को गाली ,,

परिवर्तन की आडो में अब और कुहासा नहीं चाहिए ,,

संग्रामो की गाथा हो और हो इंसानों को खतरा ,,,

एटम परमाणु की अभिलाषा नहीं चाहिए ,,

गौरव हो पानी पानी हो सम्मानों में अपमान ,,,

पॉप और राक का खूब हुलासा नहीं चाहिए ,,,

कौन मांगता फूलो की तुम आहुति दो ,,,,

पर नंगे पन का और जवासा नहीं चाहिए ,,,

क्यों समलिंगता सम्मभोगो की हो लम्बी बहसे ,,,

बर्षो से जो छुपा खुलासा नहीं चाहिए ,,,

मानूँगा गा परिवर्तन और उत्थानो का सम्मान करूँगा ,,
पर निज गौरव हो दवा दवा सा नहीं चाहिए ,,,,

Sunday, 19 July 2009

वो नुक्कड़ पर बैठी अबला (कविता)


हमारे समाज में कितनी विसंगतिया है---- कही पर कुछ है और कही पर कुछ ---हमारे समाज में भी यैसे लोग है यह देख कर हर्दय घर्णा से भर जाता है ---माँ वो शब्द है पदवी है निधि है जिसका इस दुनिया में कोई मूल्य नहीं अमूल्य है -----पर उसके साथ भी ऐसा सलूक करते है लोग ----, ये कविता मैंने एक ऐसी ब्र्द्धा स्त्री पर लिखी है------ जिसके चार चार लड़के होते हए भी वो बेघर और बेसहारा है---- कोई भी लड़का उसे घर में रखने को तैयार नहीं,, वो चांदनी चौक के शानिमंदिर वाली गली के बाहर नुक्कड़ पर पटिया पर बैठी रहती है ----वही उसका घर है और जो लोग उसे दया करके खाने को दे देते है उसी से अपना पेट भरती है--- अर्ध विक्षिप्ता सी हो गयी है -----आँखे भर जाती है और आँशू अपने आप बहने लगते है ----फिर चाहें कविता के रूप में ही क्यूँ न हो ,,
वो नुक्कड़ पर बैठी अबला ,,
आभारो की भाषा कहती है ,,,
हर आने जाने वालो को ,,..
उत्सुक ताकती रहती है ,,,
कर्मो की परिभाषा का ,,,
शायद उसको ज्ञान नहीं ,,,
स्रष्टि की अभिलाषा का ,,,
शायद उसको संज्ञान नहीं ,,,
हुयी बुजुर्गा तो बैठा दी ,,,
लाकर इस नुक्कड़ पर,,,
रही स्वामिनी जिस घर की ,,
एक पल में छूटा वो घर ,,,
चेहरे की झुर्री दर्दो की ,,,
बोली बोल रही है ,,,,,
उसकी ये दयनीय दशा ,,,,
जीवन की सच्चाई खोल रही है ,,,,
टुकड़े खा ,टुकडो को पाला,,,,
अब टुकडो पर जीती है ,,,,
देना देना और बस देना ...
क्या माँ की ये ही रीती है ,,,,
मरणासन्न पड़ी है , मरने को है ,,
पर जाने क्यूँ सांसो को अबरोध दिए ,,
रोज ताकती है पथ को ,,,,
आशा की एक किरण लिए,,,,
शायद मिल जाये वो टुकड़े ,,,
जो टुकड़े थे खुद के किये ,,,
क्या उसकी ममता का ,,,
परिणाम यही होगा ,,,,
लहू से पाला पोषा जिनको ,,,,
क्या उनको ध्यान नहीं होगा ,,,
प्रश्न पूछती आँखे उसकी ,,,
पर आशा रहती है,,,,
वो नुक्कड़ पर बैठी अबला ,,
आभारो की भाषा कहती है

Thursday, 16 July 2009

हे मदिरा देवी कितना कलुषित है है तेरा हास (कविता)


उठता है गिरता है ,,,,
फिर लेता है करुना मिश्रित साँस,,
हे मदिरा देवी कितना कलुषित है है तेरा हास ,,,
अंतस से अंतस में कुंठित होता है ,,
चेतन मन का चेतन खोता है ,,
पल पल अपनी गाथा गाता ,,
तेरे मद में डूबा जाता ,,,
पल पल उसका भीषक होता ,,,
फिर भी न धारिता खोता ,,,
लाखो चुम्बन देता इस अबनी को ,,
निज कदमो की घबराहट से ,,
मानो प्रेमी आलिंगन करता हो निज सजनी को ,,
सब भाव शून्य सब ज्ञान शून्य ,,,
अपनी मस्ती में मस्त अहो ,,
अपना खो कर के जो झूमे,,
है येसा ज्ञानी कौन कहो ,,,
सव सौन्दर्य विलाशित जीवन को ,,
दे दी है उसने तिलांजलि ,,,
इस माया माय स्रष्टि से हट कर के ,,
ले ली है मधु की एक अन्जली ,,
भाता है उसको अपना जीना ,,
गर्वित है उसका सीना ,,
कर्तव्य परायण हे रसिक प्रिये ,,
फिरते हो कैसा व्रत कठिन लिए ,,
सब साम्राज्य तुम्हें त्रण तिनका है ,,,
उन्हें समर्पित वह जिनका है ,,,
करता है श्रम नित दिन वासर ,,
लेता न कभी विश्राम अहो ,,,,
अपना खोकर के जो झूमे ,,येसा ज्ञानी कौन कहो ,,

Tuesday, 14 July 2009

हूँ कारगिल का बलिदान सुनो,,(कविता}


आज मेरा जन्म दिन है अपने जन्म दिन के उपलक्ष में मैं ये कविता आप लोगो के सामने रख रहा हूँ हमारे यहाँ जन्म दिन पर पुत्र अपनी माँ को कोई भेट देता है तो मैं भेट स्वरूप अपनी यह कविता अपनी तीनो मांओमेरी जन्मदेने बाली माँ मनोरमा माननीय निर्मला जी और भारत माँ को समर्पित कर रहा हूँ इस कविता में मैंने अपने आप को प्रदर्शित करने का प्रयाश किया है और अपने आप को भारत माँ के कण कण से जोड़ने का भी मैं कहाँ तक सफल रहा ये तो आप की प्रतिक्रिया ही बताएगी


मैं आज चाहता हूँ देना परिचय,,
हूँ भारत माँ का सम्मान सुनो,,
मैं रास्ट्र भक्ति की बोली हूँ ,,,,
हूँ झंडे का मान सुनो ,,,
मैं परिवर्तन की भाषा हूँ ,,
अंगारों भरी जुबान सुनो ...
मैं बोली हूँ हुंकारों की ,,,
चीख नहीं ललकार सुनो ,,,
मैं हूँ शोणित वीरो का ,,,
और गीता का भी ज्ञान सुनो ,,,
निर्बल का मैं संबल हूँ ,,
रोतो की मुस्कान सुनो ,,
मैं आज चाहता हूँ देना परिचय,,
हूँ भारत माँ का सम्मान सुनो,,
मैं रास्ट्र भक्ति की बोली हूँ ,,,,
हूँ झंडे का मान सुनो ,,,
मैं गोबर लिपा गलियारा हूँ ,,,
हूँ कच्चा जुडा मकान सुनो ,,
दिन की घनी दुपहरी हूँ ,,,
मैं खेत में जुता किसान सुनो,,
मैं हल के मुठ्ठे की छोटे हूँ ,,,
हूँ बैलो के बंधान सुनो ,,,
मैं जौ बाजरे की रोटी हूँ ,,
हूँ फुलवारी धान सुनो ,,,
मैं आज चाहता हूँ देना परिचय,,
हूँ भारत माँ का सम्मान सुनो,,
मैं रास्ट्र भक्ति की बोली हूँ ,,,,
हूँ झंडे का मान सुनो ,,,
मैं मंदिर का बजता घंटा हूँ ,,
हूँ मस्जिद की अजान सुनो ,,,
मैं चौपाई हूँ रामायण की ,,
हूँ पवित्र कुरान सुनो ,,,,
मैं हिन्दू मुस्लिम दंगे में पिसता,,
हूँ निर्बल इंसान सुनो ,,,
मैं वाणी हूँ रहीम की ,,
हूँ तुलसी का ज्ञान सुनो ,,,
मैं आज चाहता हूँ देना परिचय,,
हूँ भारत माँ का सम्मान सुनो,,
मैं रास्ट्र भक्ति की बोली हूँ ,,,,
हूँ झंडे का मान सुनो ,,,
मैं दुर्घटना लाल बाग़ की ,,
हूँ कारगिल का बलिदान सुनो,,
मैं लुटा सिन्दूर अबलाओं का ,,
हूँ त्रासदी भरा बखान सुनो ,,,
उस माँ का इकलौता बेटा हूँ ,,,
इस धरती माँ पे संधान सुनो ,,
रो रो कर पत्थर होती आंखे हूँ ,,
जिन्दा होकर हूँ बेजान सुनो ,,,
मैं आज चाहता हूँ देना परिचय,,
हूँ भारत माँ का सम्मान सुनो,,
मैं रास्ट्र भक्ति की बोली हूँ ,,,,
हूँ झंडे का मान सुनो ,,,

Sunday, 12 July 2009

पति की पद बंध्या भारतीय नारी है(कविता)


स्त्रियों की दशा और उनकी स्तिथि पर ना जाने कितना लिखा और किया गया पर क्या उनकी स्तिथि सुधरी है मुझे तो नहीं लगता की उसमे जरा भी सुधार हुआ है ,, महिला अरक्षन की बात करते है इसमें महिलायों का हित कम अपनी राजनैतिक और आर्थिक मह्तात्ता ज्यादा होती है कहते है महिलाये हर क्षेत्र में है मानता हूँ हर क्षेत्र में है पर कितनी क्या वे उन पिछडी महिलायों की बात कर रहे है जिनकी स्तिथि में सुधार की आबश्यकता है मैं नहीं मानता की आम महिलायों की स्थिति में कोई सुधार हुआ है हाँ प्रताड़ना के तरीके और शोषण के तरीके जरुर बदले है पहले किसी और ढंग से प्रताडित और शोषित अब किसी और ढंग से पर क्रम रुका नहीं है अगर रुका होता तो येसी घटनाये नहीं होती जो आज भी आम है कुछ अखबारों में आती है कुछ खो जाती है ऐसी ही एक महिला की घटना मेरे भी दो आंशू उसे सत्वब्ना के रूप में



यह महिला सशक्तिकरण की बात ,,
करने वालों के गाल पर तमाचा है ,,
महिलायों के नाम पर सिक रही ,,
राजनैतिक रोटियों की जली हुई बू है ,,,
उत्पीडन और प्रताड़ना ,,,
झेलती एक आवाज है ,,
समाज से किया गया ,,
प्रश्नातुर सम्बाद है ,,,
प्रगति की खाल के नीचे,,
सडन मारता झूठी परंपरा का घाव है ,,
ये संसद के गलियारों में,,,
आरक्षण के लिए चीखती ,,
राजनितिक सत्ता नहीं है ,,
टीवी पर न्यूज़ पढ़ती और ,,
फिल्मो में नाचती सुन्दरता भी नहीं है ,,
ये डिस्को में रंगिनिया मनाती ,,
उन्मुक्तता भी नहीं है ,,
न ही ये जुलूश निकालती ,,
हक़ मागती शक्ति ही है ,,
ये निश्छल ममत्व भरी माँ है ,,,
स्नेह और त्याग भरी बहन है ,,
असीम पीडा और दर्द समेटे पत्नी भी है ,,,
और अनेको रिश्तो के जाल में ,,
घिरी उन्हें संयोजित करती एक स्त्री भी ,,
पर सबसे अलग ये असह त्रासदी झेलती ,,

पति की पद बंध्या भारतीय नारी है ,,,,

Saturday, 4 July 2009

ओस असीम को असीम से सेता हूँ ,,,, (कविता)


नव बैभव फैला डाली डाली,,
ओस की बुँदे ,,
तिनको की कोरे ,,
कुंठित भौरे ,,
दुखिता का राग ,,
मधु की चाहत ,,
मधु का पाना ,,
मधु से लेना वैराग ,,
करना निज मधु पे त्याग ,,
निज निजता का भान ,,
व्यर्थता ,,,
सुख वा मान ,,,
जीवन की थोड़ी दुखिता ,,
इस कलुषित से विमुखता ,,
उस दिव्य की ओर का एक पल ,,
उस नव्य की हर्दय में हलचल,,
देती है कैसी मीठी उमंग ,,
भरती है नीरस जीवन में रंग ,,
करती दुखिता का रंग भंग ,,
पुलकित होता अंग अंग ,,
जब निज का निज में मिलता रंग ,,
होती अंतस में धीमी जंग ,,
फिर असत्य के खोल में ,,
सत्य को मैं पा लेता हूँ ,,
हार सारी स्रष्टि जंगो को ,,
अंतस पे विजय मैं पा लेता हूँ ,,
तब उस असीम को ,,
असीम से सेता हूँ ,,,,

Friday, 3 July 2009

क्या लिखूं ..(कविता)


सोचता हूँ क्या लिखूं .
वतन की वाह में ,,
वतन की वाह में ..
वतन की आह में ..
ऊँची कोठिया लिखूं ,,
या बिकती बेटियाँ लिखूं ,,
मनती पार्टिया लिखूं ,,
या सूखी रोटियाँ लिखूं ,,
उनकी धायिया लिखूं ,,
या माँ की झायिया लिखूं,,
खेत में पड़ी हुई खाईयाँ लिखूं ,,
या बैल संग जुत रही विवायिया लिखूं ,,
किसान की दशा लिखूं ,,
या देश की मनोदशा लिखूं ,,
प्रगति की कथा लिखूं ,,
या दुर्गति की व्यथा लिखूं ,,,
सोचता हूँ क्या लिखूं ,,
वतन की वाह में ,,
वतन की वाह में ,,
वतन की आह में ,,,
उचायियों की होड़ लिखूं ,,
या पश्चिमी अंधी दौड़ लिखूं ,,
वोट की दुकान लिखूं ,,
या जलते मकान लिखूं ,,
उनकी झूठी शान लिखूं ,,
या इन की छिनती मुस्कान लिखूं ,,
चाहो कन्यादान लिखूं ,,,
दहेज़ का विधान लिखूं ,,
जलती बेटियाँ लिखूं ,,
या फिर उड़ती पेटियाँ लिखूं ,,
उनकी तबाहियाँ लिखूं ,,
या इनकी वाह वाहिया लिखूं ,,
और क्या लिखूं ,,
पतन की राह में ,,,
सोचता हूँ क्या लिखूं ,,
वतन की वाह में ,,
वतन की वाह में ,,
वतन की आह में ,,,,

Thursday, 25 June 2009

इश्क की आंधी में हम तो इश्को इश्क हो गए है ,, (कविता)


ये कविता मैंने कई दिन पहले लिखी थी पर बड़े संकोच बस इसे मैं अपने ब्लॉग पर नहीं डाल रहा था पर मित्रो की राय और उनकी अनुसंसा से मैं इस कविता को आप के सन्मुख रख रहा हूँ और इस कविता को मैं अपनी माँ निर्मला कपिला जी के चरणों में समर्पित कर रहा हूँ आप की राय और सुझाव का बड़ी बेसब्री से इन्तजार है

किस्मतो से जब इश्क गुलजार होता है सीने में,,
मुकद्दर से जब उनका दीदार होता है नगीने में ,,
धड़कने रुक जाती है निगाहे लगती है निगाहों का अश्क पीने में,
फिर जमी पे है जन्नत कहाँ , क्या रक्खा इस नाचीज जीने में ,,

ये नवी तूने किया क्या हम तो पागल हो गए है ,,
इश्क की नजरो से तेरी हम तो घायल हो गए है,,
इश्क की आंधी में हम तो इश्को इश्क हो गए है ,,
तेरी इश्क जन्नत की ख़ुशी है ,इश्क है नजरो का पर्दा ,,
इश्क खुसबू की नमी है ,, इश्क है सांसो का सरदा ,,
इश्क है सावन की बहारे, इश्क घटती घटाए है ,,
इश्क महबूब की महफ़िल ,,इश्क गम की सदाए है ,,
इश्क है राग दिल का , इश्क चलती हवाए है ,,
इश्क बर्षो से जोड़ी इस जवानी की कीमत है ,,
इश्क दिल की जरुरत है ,, इश्क उसकी मोहब्बत है ,,
इश्क का खाशो खाश अमला , इश्क दुनिया से बगावत है ,,,
इश्क चाँदी ,इश्क सोना ,इश्क सबकी जरुरत है,,
इश्क में डूब लो यारो, इश्क ही खुबसूरत है ,,,
इश्क सरगम ,इश्क ताने ,इश्क की धुन निराली है ,,,
इश्क जलता हुआ शोला , इश्क ही तो दिवाली है ,,
इश्क है साँस दुनिया की ,इश्क जन्नत का ठिकाना है ,,
इश्क है हुस्न उसका , इश्क मिलने का बहाना है ,,
इश्क अल्लाह का सजदा है , इश्क ख्वाजा को पाना है ,,
महफिले इश्क में हमको तो, इश्क इश्क गाना है ,,
इश्क बारूद की ढेरी, इश्क खंजर का मुहाना है ,,
इन जलती फिजाओ में इश्क सबसे पुराना है ,,
इश्क सजदा , इश्क जन्नत ,इश्क दरिया ,,
इश्क का रूप न्यारा है,,
इश्क अल्लाह की रहमत है ,इश्क ख्वाजा को प्यारा है ,,
इश्क को ढूडती दुनिया,इश्क ने हम को मारा है ,,,
इश्क को बांध बाँहों में , हम तो जाहिल हो गए है ,,
ये नवी तूने किया क्या हम तो पागल हो गए है,,
इश्क की आंधी में हम तो इश्को इश्क हो गए है ,,

Monday, 22 June 2009

माटी के गद्दारों को,,(कविता)


कल रात स्वपन में मैंने देखा,,
भारत के सरदारों को .
माटी के गद्दारों को ,,
चूहों के परिवारों को ,,
इस धरती माँ के भारो को ,,
इन संसद के बेकारो को ,,
भारत की खूब गरीबी देखी ,,
फिर देखा इन के श्रंगारो को ,,
नंगे पद चलते भारत देखा ,,,
फिर देखा इनकी महंगी कारो को..
हाथ फैलाये बच्चे देखे ,,,
फिर देखा इनके नारों को ,,
कमर तोड़ती महगाई में ,,
घुट घुट जीते परिवारों को ,,
धू धू कर जलती बस्ती देखी,,
फिर भासड करते मक्कारों को ,,
कल रत स्वपन में मैं ने देखा ,,
माटी के गद्दारों को ,,
भारत के सरदारों को ,,
इस धरती के भारो को ,,
क्या क्या देखा मैंने ,,
सत्ता लोलुप सियारों को ,,
खुद का सौदा करते इन बेचारो को ,,
रास्त्र प्रेम में मरते सैनिक देखे ..
फिर कफ़न बेचते इन मारो को ,,
वोटो की खातिर , नोटों से खातिर ,,
करते वीभत्स नजारों को,,,
अब और नहीं कुछ रहा देखना,,
जब देखा भीषण नर संहारों को ,,
कल रात स्वपन में मैंने देखा,,
माटी के गद्दारों को,,
भारत के सरदारों को ,,इन धरती माँ. के भारो को,,

Thursday, 18 June 2009

क्यों सत्य को पखार दूँ ?/(कविता)


महज मान के लिए ,,,,
क्षणिक मान के लिए ,,,
क्यों सत्य को पखार दूँ ?/
प्रेम वासना के लिए,,
चालित रसना के लिए ,,
दिव्य क्यों निकार दूँ ?/
जन्म जन्मान्त से दवी,,
सुप्त इच्छाओ को ,,
जाग्रत कर क्यों पाप लूँ?/
सत्य को क्यों पखार दूँ ? /
इस भंगुर जिस्म की चाहता ,,,
इस सुख तिलिस्म की चाहता ,,
यह स्वर्ण लेपित लहू पर्त है,,
पाताल व्यापी गहन गर्त है ,,
क्यूँ जान कर मैं विहार करूँ ??
सत्य को क्यों पखार दूँ ??
दुखितो का लहू पान कर ,,
धनिकों को धन दान कर ,,
अपूज्य को पूज्य मान कर ,,
सुधा वाट में विष पान कर ..
क्यूँ अखाद आहार करू ??
क्यों सत्य को पखार दूँ ?/
क्यों अनित्य को नित्य मान लूँ ?
क्यों भेद को अभेद मान लूँ ?
क्यूँ सुख में दुःख उर डाल लूँ ?
क्यों सुक्ष्म को गहन मान लूँ ?
क्यों अब आत्म तत्व का संघार करूँ ?
क्यों सत्य को पखार दूँ ?
क्यों दिव्य को निकार दूँ ?

Monday, 15 June 2009

आखिर क्यों चाहते हो समाज में बराबरी,,


क्यों विकल हो तुम ,,
आखिर क्यों चाहते हो समाज में बराबरी,,
क्यों नहीं आती है तुम्हे संतुष्टि ,,
मिल तो रही ही है ओला वर्षटि,,,
और क्या चाहिए तुम्हें ,,,
आखिर किसान ही तो हो ,,
तुम्हें साक्षरता और शिक्षासे क्या लेना .....
लोग चाँद पर जाये या मंगल पर ,,
तुम अपना हल चलाओ ,,,
और पैदा करो अन्न ,,,
हमारा पेट भरने के लिए ,,,
साथ में लगा लो ,,
अपने नादान बच्चो को हसिया और कुदाल दे कर ,,
और प्रसवा पत्नी को भी दुदमुहे बच्चे के साथ ,,
क्या फर्क पड़ता है ,,,
तुम भूखे सो ओ ,,
या तुम्हारे बच्चे दवा के आभाव में,,
विलख कर मरे ,,
और तुम्हारे पास पैसे न हो ,,,
आखिर देश तो प्रगति कर रहा है ,,
अब कर्ज में जान दे दो,,,
या रेलवे ट्रेक पर लेटो ,,,
या फिर गिरवी रख दो ..
अपनी बेटियों की अस्मिता ,,,
और बेटो की स्वतंत्रता ,,,
साहूकारों के घर में,,,
आखिर कर्म ही तो धर्म है तुमारा ,,,
ये क्यों कहते हो तुम्हें कुछ नहीं मिला ,,
मिला तो है ,,,
जय जवान जय किसान का नारा ,,,
रास्ट्र आय में भरी योगदान का सम्मान ..
और गरीबी भी तो मिली है ,,
अशिक्षा, बीमारी,भुखमरी ..
ये सब काफी कुछ तो मिला है ,,,
ये क्यूँ कहते हो शहर में मेट्रो है,,
गाँव में सडके नहीं है ,,अस्पताल नहीं है
स्कूल नहीं है ,,
आखिर उनके बिना रहने की तुम्हारी आदत तो है,,
क्यों कहते हो सरकार ने तुम्हें कुछ नहीं दिया ,,,
आखिर दिया तो है ,,,
अन्नदाता का सम्मान ,,
अन्नदाता कहलाने का अधिकार ,,,
भले ही तुम्हारी मौत भूख से हो ,,,
पर हो तो अन्नदाता
क्यों नहीं आती तुम्हें संतुष्टि

मार्गदर्शक बनो ,,


मार्गदर्शक बनो ,,
कर्तव्य का बोध करा दो,,
सुपथ में मुझे लगा दो ,,,
लक्ष्य च्युत हूँ मैं ,,
पथ विमुख हूँ मैं ,,,
अज्ञान के भवर से ,,
ज्ञान के थल तक ,,
नैया पार लगा दो ,,,
कर्तव्य का बोध करा दो ,,
सुपथ में मुझे लगा दो ,,
क्या सत क्या असत ,,
सोच दिग्भ्र्मीत होता हूँ ,,
इस सत असत के क्षोभ से ,,
इस जग द्वंद के लोभ से ...
छोड़ सारी रीतिया ,,
अपना अनेक कुरीतिया ..
प्रकश नित ढूडता हूँ ,,
गर्त में नित बूड़ता हूँ ,,
और तमिष और तमिष,,
मैं खुद बढा रहा हूँ ,,
सत्य सत्य छोड़ के ,,
असत्य पथ पढ़ा रहा हूँ
छोड़ना चाहता इस कलुष द्रश्य को ,,
चाहता जगनी ब्रह्म स्र्द्श्य हो ,,,
पर बधा हूँ विकल हूँ ,,
छूटता दामन नहीं,,,
टूटता बंधन नहीं ,,
बन्धनों को काट मुक्ति दिला दो ,,,
निज साक्षात्कार करा दो ,,
सुपथ में मुझे लगा दो ,,,
कर्तव्य का बोध करा दो ,,,
मार्ग दर्शक बनो ,,,,

Sunday, 7 June 2009

बोझिल नैनों से नीद उडी है ,,कविता )


बोझिल नैनों से नीद उडी है ,,

आँखों की चौखट पर महबूब कड़ी है ,,

अपलक अपलक ठगी लखे,,,

झर झर झर झर नीर वहे,,,

यादो के आगोसो की बर्षा,,,

करना प्रिये अभी रात पड़ी है ,,,

बोझिल नैनों से नीद उडी है ,,

आओ प्रिये मैं अमृत घोलूं ,,,

अकटक अविचल तेरा होलूं ,,

निजता की इस मधुमय वेला में,,,

क्यों रूठी रूठी दूर कड़ी है ,,,

बोझिल नैनों से नीद उडी है ,,

आगोसो में आ एक लाक हो जा ,,,

मैं तुझमे तू मुझमे खो जा ,,,

मैं तेरा तू मेरी हो जा,,,,

आओ अब प्यास बढ़ी है ,,,,

बोझिल नैनों से नीद उडी है ,,

संगीतो की साँझ सजा दो....

मुखरित कर दो गालो की लाली ,,

लव से लव तुम टकरा दो ,,,

मिलने की अब चाह बढ़ी है ,,,

बोझिल नैनों से नीद उडी है ,,

अपना ये कौमार्य मिटा दो ,,,

निज को तुम अब सुरभित कर लो ,,,

मुझको तुम बाँहों में भर लो ,,

मिटने की अब तड़प बढ़ी है ,,,

बोझिल नैनों से नीद उडी है ,,

प्रवीण पथिक

9971969084

Saturday, 6 June 2009

सत्य कुछ और है ,,,,,,, (कविता )


इस हरियाली के,,

पीछे का सत्य,,,

कुछ और है ,,,

जीवन के वहाव के विपरीत ,,

जो मद्धिम सा है संगीत ,,

उसका तथ्य ,,

कुछ और है ,,,

निश्चल बादल के नीचे,,,

जो बिजली की कड़क है ,,,

उसका कथ्य,,

कुछ और है,,

पर्वत की चोटी से गिरता झरना,,

झरने के अंतस की धरना ,,

उसका सत्य ,,

कुछ और है,,

इस पवनी का शीतल वहना,,

कानो में धीमा सर सर करना ,,

जीवन के सत से अबगत कराती ,,

उसके कहने का कथ्य ,,

कुछ और है ,,,

जब व्याकुल मन की उठती तरंग ,,

छाता मन में सत का रंग,,,

छिड़ती अंतस में धीमी जंग ,,,

होती मन की हार जीत ,,,

इस अंतर ध्वनि का सत्य ,,

कुछ और है ,,,

जब खिलता मन देख सुख ,,,

इस सुख के पीछे का क्रंदन ,,

जिसमे डूबा है कोई मन ,,

उस दुखिता मन का सत्य ,,

कुछ और है ,,,,,,,

Friday, 5 June 2009

बेहोशी के मीठे पल में,, ( कविता )


बेहोशी के मीठे पल में,,

मैं शून्य क्षितिज में फिरता था ,,,

हिम गिरी की उचाई चढ़ता था,,

फिर सागर में गिरता था ,,

कौतुक विस्मय हो लोगो को ,,

अपलक निश्चल देखे जाता था ,,

कर्तव्य विमूढ़ हो उनकी इस ,,

चंचलता को लिया करता था ,,

फिर हो सकेंद्रित निज की ,,

मस्ती में ही तो जिया करता था ,,

प्रीत और प्रेम को अनायश ही,,

खेता था,,

नीरश इन रागों में रस्वादन लेता था ,,

माधुर्य और माधुरी की ,,,

एक प्रथक कल्पना थी मेरे मन में ,,

इन वेढ़न्गों से अलग,,

वाशना थी मेरे मन में ,,

कभी प्रेम की व्याकुलता को ,,

मैंने महसूश नहीं क्या था,,

कभी ह्रदय की दुर्वलता को ,,

मैंने महसूश नहीं क्या था ,,

सौन्दर्य वशन इस धरती का ,,

मेरा प्रेमांगन था ,,

ऋतुओ का परिवर्तन ही ,,

मेरा प्रेमालिंगन था ,,

हर शर्द किन्तु चौमुखी हवा,,

मुझको हर्षित करती थी ,,,

सूरज की एक एक किरणे ,,

उल्लासो से भरती थी ,,,

बस नया प्रेम अब खोज रहा हूँ ,,

वो सब भूल भूला के ,,,

छेड़ रहा हूँ नयी तान ,,

रागों में खुद को मिला के ,,,

Thursday, 4 June 2009

सानिध्य के लिए क्यों ,,


ओ सत्य के प्रकाशक,,
ये जगत के शासक ,,
सानिध्य के लिए क्यों ,,
तड़पा रहे हो ,,
विकल हूँ इस तमिष ..
भरे जीवन से ,,
दुखिता के इस क्रंदन से ,,,
सामीप्य के लिए तड़प रहा हूँ ,,
अकिंचन उत्कंठा लिए ,,,
अनमिलन की कुंठा लिए,,
हिलोरे मारते सागरों की,,
छातियों पर,,
आत्म मंथन का द्वार,,
खोलता हूँ,,
वैराग का द्वार ,,
खोलता हूँ ,,
फिशलती है ,,
समीप की सीडिया ,,,
डूब जाती है कई ,,
पीडिया ,,
अगम्य अथाह गर्त की ,,
कोख में ,,
पर तेरी चाहता उतर ..
देती है सारे बन्धनों को,,
मिटा देती है,,
सारे क्र्न्दनो को,,
जड़ कर देती है उनके हौसलों को ,,
जो है आत्म ज्ञान के हासक,,,
ओ सत्य के प्रकाशक ,,
ये जगत के शासक ,,
सानिध्य के लिए क्यों ,,
तड़पा रहे हो ?
ant

Tuesday, 2 June 2009

म्रत्यु का आवाहन कर रहा हूँ ,,


म्रत्यु का आवाहन कर रहा हूँ ,,

निज से निज में उतर रहा हूँ ,,,

मौन है उद्देव्ग सारेहै दिशाए शून्य सी ,,

अस्पस्ट है कुछ धुंधली सी तस्वीर मेरे मन की ,,

शून्य से शून्य में चाहता विलुप्त होना ,,,

अंतरिक्ष के कोने में चाहता खोना ,,

चाहता हूँ इन तनो सर्व कालिक मुक्ति ,,

बनना चाहता हूँ मैं सर्जन की शक्ति ,,

अविरल अविराम मैं सर्जन चाहता हूँ ,,

पल पल नया नवीन संगीत चाहता हूँ ,,

कुछ दुदुम्भी बज रही है मेरे ह्रदय में ,,

मानो रण की रण भेरिया हो ,,,

होश और जोश से पल पल भर रहा हूँ ,,

आज अब शोक गीत का गान कर रहा हूँ ,,

म्रत्यु का आवाहन कर रहा हूँ ,,

उदिग्न सारे मिट रहे है तेज के ताप से ,,

मिट रही है दूरिया तेज के प्रताप से ,,,

रौशनी कही से कुछ कुछ दबी आ रही है ,,,

जिन्दगी पल पल सिमटती जा रही है ,,,

कही अजात से कोई मुझे बुला रहा है ,,,

कानो में कोई पल पल म्रत्यु गीत गा रहा है ,,

रौनके धुली धुली , खुला आशमा है ,,

जल के क्यों बुझ रही ये समां है ,,

सब सफ़ेद हो रहा है रंग छोड़ के ,,,

साथ था जो कभी, जा रहा है जीवन भी मुह मोड़ के ,,

हाथ मलता रहा पल पल विकल रहा ,,

अब तक संग जिन्दगी के मैं चलता रहा,,

अब ये तन तेरी शरण कर रहा है,,

अब मैं म्रत्यु का बरण कर रहा हूँ ,,,

म्रत्यु का आवाहन कर रहा हूँ ,,

Monday, 1 June 2009

कन्या की आज परिक्षा है ,,,


जब तीव्र विकल मन रोता है ,,,

तीखी पलकों की नोकों से ,,

मानो धरणी का अंतस ,,

विखर रहा हो ॥

तेज हवा के झोको से ,,

सब द्रग अपलक देख रहे है ,,

सांसो की तेज वहारो को ,,

संग्राम विजित सी गंगा हो ,,

उसकी चंचल धारो को ,,,

कौमार्य साधने को ,,

कन्या की आज परिक्षा है ,।

या धैर्यशील वीरो की ,,,

व्यभिचारी इच्छा है ,,,

ज्ञान सुप्त कुमुदनी सा ,,

कुंठित होता जाता है ,

जो सागर तन में क्रीडा करता ,,

उसमे डूबा जाता है ,

क्यों मौन शब्द क्ष्र्न्ख्लाओ के ,

अनवरत मैं भाल सहूँ ,

क्यों कर्तव्य विमुख हो ,

मन की टेडी चाल सहूँ ,,

सब लोल विलोल हिलोल हुए ,

सब जीर्ण हुए सब गोल हुए ,

सब फिसल रहे ,

सब डाबा डोल हुए,

कभी वेदना के सागर में ,,

उसके तीव्र हिलोरो से ,,

कहकहे सुनाई देते है ,,

हर चपला सी चपल हँसी,

कानो में शीशा भरती है ,,

मानो बेढंगे की हर ऊँगली ॥

तबले पर चोटे धरती है ,,

मैं समुद्र शांत सा स्थर मन ,,

करके बढ़ता जाता हूँ ॥

हर कठिनाई से कठिनाई का

रास्ता पढता जाता हूँ ,

हर विष कलश डालता हूँ ,,

कंठो में गंगा के सुभषित जल सा ,

हर बार झेलता हूँ ,,

स्म्रतियों के पल सा ,,,




Saturday, 30 May 2009

अब स्याह धुआ सा उठता है ,


अब स्याह धुआ सा उठता है ,

वेदी की पावन आगो से,,,

अब रुदन सुनाई देता है ,,

फागुन के मीठे फागो से,,

अब गीता की अद्भुत वाणी ,,

जीवन में उल्लाश नहीं भरती,,

अब मंदिर की टन टन घंटी ,,

जीवन में आश नहीं भरती ,,

हर ओर कीट पतंगों का ,,

अब शोर सुनाई देता है ,,,,

हर गली मोड़ पर भिखमंगो का ,,

अब जोर दिखाई देता है ,,

आमो के सुन्दर पेडो पर ,,,

अब कोयल गान नहीं करती,,

गंगा के पावन घाटो पर॥

अब कोई माँ दान नहीं करती ,,

लहू पुता सा क्षितिज और ,,

,अब भीवत्स धरा दिखती है ,,

मानो अंगारों की वर्षा हो ,,,

अब यैसी सावन की बूंद वर्षती है ,,

अब धरती की सुन्दरता ,,

मन में संज्ञान नहीं धरती,,,

बूंदों की लय के ऊपर ,,,

अब कोई गोरी गान नहीं करती ,,

अब तीव्र रोष सा उठता है ,,

जन जन की हुंकारों में ,,,

प्रतिशोध दिखाई देता है ,,,

अब बहती नदियों की धारो में,,

अब चीत्कार सुनाई देता है ,,,

भारत के अन्तरंग भागो से ,,,

अब स्याह धुआ सा उठता है ,

वेदी की पावन आगो से,,,

Tuesday, 26 May 2009

आज देश को फिर वसन चाहिए \




आज देश को फिर वसन चाहिए \


खून से सना ही सही , तन चाहिए \


जाति धर्म की आग लग रही ,


कोने कोने में,,


देश वैर वैमनस्यता जलाये जारही ।


इस आग के समन का कुछ जतन चाहिए\


आज देश को फिर वसन चाहिए \


खून से सना ही सही , तन चाहिए \


उड़ रही है खून मॉस की आंधिया\


अब और भी निर्वस्त्र हो रही है वेटियाँ \


भूंख और प्रतारणा लिए किसान जी रहा है \


बूंद की आश में बूंद बूंद पी रहा है \


इस मौत की घडी में कुछ हसन चाहिए \


आज देश को फिर वसन चाहिए \


खून से सना ही सही , तन चाहिए \


विकाश और विलासता की लम्बी दौड़ में \


प्रगति और प्रगति की तीखी होड़ में \


जीवन की सहज गति को हमने भुला दिया \


रास्ट्र की प्रगति को हमने भुला दिया \


आज और नहीं इसपे कुछ मनन चाहिए \


आज देश को फिर वसन चाहिए \


खून से सना ही सही , तन चाहिए \


पुकार उठ रही हिम की कन्द्राओ से \


कुछ लव्ज छन के आ रहे प्रसान्त की धाराओ से \


खून से सनी माटियाँ पुकारती है \


देश हित में लड़ी घटिया पुकारती है \


फिर से नेता सुभाष ही करे या गाँधी ही करे \


मुझको तो इन रास्ट्र द्रोही ताकतों का दमन चाहिए \


आज देश को फिर वसन चाहिए \


खून से सना ही सही , तन चाहिए \


Tuesday, 12 May 2009

वो खड़ी थी चौक पर,,,


वो खड़ी थी चौक पर,,,
और चिल्लाये जा रही थी,,
थी महान वो भी कभी ,,,
ये गीत गाये जा रही थी,,,,
अर्धनग्न थी वो .,,,
कम वसन में ,,,
पर नग्नता छिपाए जा रही थी ,,,
गिर रहे अंध प्रक्रति के पत्थरों से,,,
जीर्ण वसन बचाए जा रही थी ,,,
मौन भीड़ थी खड़ी ,,,,
हाथ में प्रगति की तख्तिया लिए ,,
वो संरक्षण और अनुदान की ,,
जूठनेखाए जा रही थी ,,,,
बटोरती थी चंदो को ,,,
खुद के संबल के लिए ,,,
फिर बाँटती थी उसको ,,
निर्बल के बल के लिए ,,,
यही तो उसके जीवन की आस्था रही है ,,,
तभी तो वो सर्वोच्च सभ्यता रही है ,,,
आधुनिकता के तीर कर रहे थे,,,
उसके वदन को तार तार ,,,
पर वो मुस्कराए जा रही थी ,,,
हर घडी तीर की सहूलियत को,,
आगे आये जा रही थी ,,
मर रही थी पल पल वो ,,,
फिर भी बताये जा रही थी,,
कभी रही थी विश्व की सर्वोच्च संस्कृति ,,,
हूँ भारतीय सभ्यता ये गाये जा रही थी ,,,,,
वो खड़ी थी चौक पर,,,
और चिल्लाये जा रही थी,,

Thursday, 7 May 2009

मेरे टूल

रफ़्तार

Tuesday, 5 May 2009

फिर दो गालियाँ और ,,,




तुम मुझको और घसीटो ,,


रक्त रंजित कर दो मेरा मस्तक,,


इस तरह पैविस्त करो ,,,


साम्प्रदायिकता और जातिबाद की कीले,,


मेरे बदन में,,,,,


कि एक इंच जगह ना छूटे ,,


कुरेदो उन्हें इतना कि ,,,


फूटने लगे खून के फब्बारे ॥


फिर दो गालियाँ और ,,,


उछालो मेरी अस्मिता को ,,


करो मेरा चिर हरण ,,


क्षेत्रबाद के तीखे नाखूनों से ,,


तुम चाहो तो कर सकते हो ॥


मेरे और हजार टुकड़े ,,


बुंदेलखंड पूर्वांचल और ,,


हरित प्रदेश बना कर ,,


फिर भी दिल ना भरे तो ,,


नीलाम कर दो मेरी ,,,


अखंडता और सहिष्णुता को ,,


क्षेत्रिय व जातीय पार्टी बनाकर ,,


रोज मारो बेईमानी और ,,,


भ्रष्टाचार के तमाचे मेरे गाल पर ,,,


तब तक कि उसमे से भुखमरी ,,


और गरीबी का पीव ना बहने लगे ,,


भरदो स्विश बैंक के खाते॥


मेरे अन्त्रावस्त्र बेचकर ...


नोच खाओ मुझे और ,,


बेचो मेरा मांस नोच कर ,,,


बंद कर लो अपनी आंखे ,,


मेरे बलात्कार्य पर ,,,,


क्यों कि मैं तुम्हारी ,,


भारत माँ ही तो हूँ ,,,,






Monday, 27 April 2009

माँ तू अमित संगिनी मेरी,,,


तेरी उपमा किससे कर दू,,,

किससे दूँ तेरा सम्मान ,,,

मेरा जीवन भी तो तेरा है ,,,

फिर दूँ क्या तेरे को तेरे से मान ...

माँ तू अमित संगिनी मेरी ,,,

हर सांसो प्र्स्वासो में,तेरा भान ,,,,

जब कभी विकल व्याधि सी" माँ ,,

मुझको पीडा बहुत सताती है,,,

जब कभी तीव्र उलझनों से,,,

दुनिया मेरी रुक जाती है ,,,

हर घडी पास तुझको मैंने पाया है ,,,,

जब कड़ी धूप में आता बादल ,,,,

लगता तेरे आंचल का साया है ,,,

इन दूर दूर गामी देशो में रह कर ,,

इन विविध विविध वेशो में रह कर ,,,

माँ मैं कभी नहीं तुझको भुला हूँ ,,,,

इस जीवन के नितान्त अकेले पन में माँ ,,

तुने ही तो साथ निभाया है ,,,

सुख में तू किलकारी बन गूंजी ,,,

दुःख में बनी वेदना ,,,, माँ :::::::

मौन रहूँ तो उसमे भी तू ,,,,,

विचारो की अनवरत श्रंखला है,,,,

तेरा साया पल पल मैंने महसूस किया है ...

तेरी स्म्रतियों के झोको ने भी तो ,,,

नवजीवन ही दिया है ,,,

मैं बौना बन यही सोचता,,,

तेरी गरिमा किससे कर दूँ ...

किससे दूँ तुझको मैं मान ,,,

तेरी उपमा किससे कर दूँ ,,,

किससे दूँ तेरा सम्मान ,,,,,

माँ याद मुझे फिर आती है ,,


माँ तेरे हांथो की रोटी ,
याद मुझे फिर आती है ,,
इन यादो की छावो में,
आँख मेरी भर जाती है ,,,
माँ जब मैं छोटा था ,,,
ऊँगली पकड़ चलाती थी ,,,
नंगे नंगे ही भाई के संग ,,,
नल पे मुझे नहलाती थी ,,,
जब फूटा था मेरा अंगूठा ,,,
दो दिन तक छत पर न सोई ,,,
चूहे ने काटा था जब माँ मुझको ...
मेरे से ज्यादा तू थी रोई ,,,,
खूब याद है मुझको माँ,,
चौके में काली लकीरे करना ,,
जीने पर चढना फिर गिरना ,,,
पर कभी नहीं दुत्कारा तुमने ,,
कभी नहीं था मारा तुमने ,,,
अंधियारे से बचने का तब ,,,
मुझमे कहाँ पे बल था ,,,
झट छुप जाता आंचल में,,,
बस उसका ही तो संबल था ,,,
माँ खूब याद है ,,,
कंडो के ऊपर चौकडी भरना,,,
फिर उनके टुकड़े टुकड़े करना ,,,,
अपनी मेहनत का ये हाल देख कर,,,
गुस्से में वो तिरछी काली आँखे ,,,
याद मुझे फिर आती है ,,,,,
माँ तेरे हांथो की रोटी ,
याद मुझे फिर आती है ,,
इन यादो की छावो में,
आँख मेरी भर जाती है ,,,

आखिर वो मेरी माँ ही तो थी ,,,


वो पत्थर तोड़ती थी तो क्या हुआ ,,,

आखिर वो मेरी माँ ही तो थी ,,,

नहीं आती थी उसको मेरी भाषा,,,,

मौन में ही सही बात करती तो थी ,,,

उसके पास गहने नहीं थे ,,,

उसके पास कपडे भी नहीं थे ,,

पर वो था जो नारी को नारीत्व देता है ...

माँ को ममत्व देता है ,,,,

उसके पास थी लज्जा ,,,,

वो बिस्तर पर शायद कभी ही सोई हो ,,,

कुछ पाने की चाह में शायद कभी ही रोई हो ,,,

हर व्यथित दिन की सुरुआत वो मुस्करा कर करती थी,,

तल्लीन हो जाती थी अपने काम में ,,,

जेठ के भरे घाम में ,,,,

जिसके बदले उसे मिलते थे पैसे ॥

जिससे बमुश्किल खरीदती थी दो जून की रोटी ,,,

मेरे व मेरे भाईयो के लिए ,,,,

मुझे याद नहीं कभी भी की हो उसने कोई फरमाइश ।

क्या नहीं रही होगी उसके दिल में कोई ख्वाइश ....

आखिर वो नारी ही तो थी ,,,,

वो पत्थर तोड़ती थी तो क्या हुआ ,,,

आखिर वो मेरी माँ ही तो थी ,,,

रात की आड़ में मैंने उसे नहाते देखा था,,,

शर्मिंदगी में आंशू वहाते देखा था ,,,

हर आहट पर लपेट लेती थी चीथडो को ,

अपने वदन के चारो ओर,,,

चेष्टा थी खुल ना जाए पाँव का कोई पोर ,,,

सुन्दरता क्या है सुन्दर क्या ,,,

क्या वो यह नहीं जानती थी ,,,,

कपड़ो से उसका सम्बन्ध वमुश्किल शरीर ढकने का ही था,,,

उसे नहीं मालूम था शिक्षा और साक्षरता के बारे में ...

पर उसमे मानवीयता थी वो दयनीयता की देवी थी ,,,

क्या फर्क पड़ता है वो भूंख से तड़प तड़प कर मरी,,,

दर्द और अवसाद में डूव कर मरी,,,

इंसानियत का ढोंग करने वालों के लिए,,,

वो एक भिखारिन ही तो थी,,,,

वो पत्थर तोड़ती थी तो क्या हुआ ,,,

आखिर वो मेरी माँ ही तो थी ,,,