Thursday, 4 June 2009

सानिध्य के लिए क्यों ,,


ओ सत्य के प्रकाशक,,
ये जगत के शासक ,,
सानिध्य के लिए क्यों ,,
तड़पा रहे हो ,,
विकल हूँ इस तमिष ..
भरे जीवन से ,,
दुखिता के इस क्रंदन से ,,,
सामीप्य के लिए तड़प रहा हूँ ,,
अकिंचन उत्कंठा लिए ,,,
अनमिलन की कुंठा लिए,,
हिलोरे मारते सागरों की,,
छातियों पर,,
आत्म मंथन का द्वार,,
खोलता हूँ,,
वैराग का द्वार ,,
खोलता हूँ ,,
फिशलती है ,,
समीप की सीडिया ,,,
डूब जाती है कई ,,
पीडिया ,,
अगम्य अथाह गर्त की ,,
कोख में ,,
पर तेरी चाहता उतर ..
देती है सारे बन्धनों को,,
मिटा देती है,,
सारे क्र्न्दनो को,,
जड़ कर देती है उनके हौसलों को ,,
जो है आत्म ज्ञान के हासक,,,
ओ सत्य के प्रकाशक ,,
ये जगत के शासक ,,
सानिध्य के लिए क्यों ,,
तड़पा रहे हो ?
ant

1 comment:

महामंत्री - तस्लीम said...

सारी तडप सानिध्‍य के लिए ही है।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }